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दीवारों में
दिये के आले
दीपक का स्वागत करते हैं
रश्मि राग में
मगन हुई
ज्योति
पताका लहराती है
तमस वज्र को तोड़
आलय को रोशनी से भर देते हैं
और
दिये के आले
बदले में
दिये से
काजल के झाले
खुद अन्तस में
धर लेते हैं
@आनन्द 18/04/2015 "मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by C.M.Upadhyay "Shoonya Akankshi" on July 19, 2019 at 11:43pm

सुन्दर रचना 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 20, 2015 at 3:14pm

बहुत सुन्दर  भाव ! आ. आन्नद भाई , दिली बधाइयाँ रचना के लिये ॥

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on April 20, 2015 at 8:01am

आदरणीय anand murthy जी भाव सुंदर हैं ...बधाई ...सादर 

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on April 19, 2015 at 9:25am

सुन्दर प्रस्तुति! बधाई!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 18, 2015 at 9:09pm

सुंदर प्रस्तुति, बधाई

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