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किसान के हालात पर - एक कोशिश

खुशी जो हमने बांटी गम कम तो हुआ

हुए बीमार भार तन का  कम तो हुआ

माँगी जो हमने कीमत मिली हमें दुआ

उनके बजट का भार कुछ कम तो हुआ

मरहूम हो गए दुःख सहे नही गए

उनके सितम का भार कुछ कम तो हुआ

माना कि मेरे मौला है नाराज इस वकत

फक्र जिनपे था भरोसा  कम तो हुआ

मालूम था उन्हें हमसे हैं वो मगर

उनकी नजर में एक ‘मत’ कम तो हुआ

अन्नदाता बार बार कहते है जनाब

भूमि का भागीदार एक कम तो हुआ 

(मौलिक व अप्रकाशित)

मैंने गजल लिखने का प्रयास किया है, क्या है? और कहाँ सुधार की गुंजाईश है, अवश्य चिह्नित करें 

- जवाहर 

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Comment

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Comment by JAWAHAR LAL SINGH on April 16, 2015 at 10:06am

आदरणीय डॉ विजय shankar साहब, आपके परामर्श के अनुसार सुधार का लिया गया आगे और अपेक्षित सुझाव की उम्मीद करता हूँ सादर!

Comment by aman kumar on April 16, 2015 at 8:56am

राजनीति से सामाजिक मुद्धों तक आपका जबाब नही ,, 

Comment by Dr. Vijai Shanker on April 16, 2015 at 6:21am
आदरणीय जवाहर लाल सिंह जी , प्रयास सराहनीय है , निखार भी आएगा , समय के साथ. सम्प्रति , फक्र जिनपे थी की जगह फक्र जिनपे था , कर लें ।
प्रयास पर बधाई।
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on April 15, 2015 at 10:01pm

जी आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी ... मैं सीखना चाहता हूँ कोशिश जारी रहेगी 

Comment by Hari Prakash Dubey on April 15, 2015 at 9:51pm

आदरणीय  जवाहर  जी  आपकी  कोशिश बहुत  बढ़िया है , बाकी विद्वजन जरूर बतायेंगे  ! सादर 

कृपया ध्यान दे...

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