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अस्थियाँ चटकीं थीं तेरी कलाई की,
मुझसे हाँथ मिलाते हुए.

इसे समझी थी तुम, शायद,
मेरी शरारत, और,
मैं क्या समझा था, मुझे कुछ याद नही.

और अब- जबकि उसके बाद,
तुम आज तक न मिल सकी ,
सोचता हूँ - -

अस्थियों की वो चटक,
क्या एक प्रहेलिका थी
जिसका अर्थ था-
रिश्ते का 'फाइनल कट्'.

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by shree suneel on March 31, 2015 at 7:57pm
आ० श्याम सर, प्रोत्साहन के लिये बहुत - बहुत धन्यवाद.
Comment by Shyam Mathpal on March 31, 2015 at 7:24pm

आ.सुनील जी,

  गागर में  सागर  . हार्दिक बधाई.

Comment by shree suneel on March 31, 2015 at 5:50pm
आ० श्याम नारायण वर्मा जी, उत्साहवर्धन के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद..
Comment by shree suneel on March 31, 2015 at 5:45pm
आ०विरेन्द्र वीर मेहता जी, रचना अच्छी लगी इसके लिए शुक्रिया...
Comment by Shyam Narain Verma on March 31, 2015 at 4:46pm

बहुत सुंदर रचना बधाई आपको

Comment by VIRENDER VEER MEHTA on March 31, 2015 at 3:17pm

बहुत सुन्दर आदरणीय श्री सुनील भाई ......" रिश्ते का 'फाइनल कट्'."  चंद शब्दों में रिश्ते का अवलोकन....

Comment by shree suneel on March 31, 2015 at 2:45pm
आ0 गोपाल नारायण श्रीवास्तव सर, कहन अच्छी लगी इसके लिए शुक्रिया. इस मंच पे नया हूँ सर. आशा है आप का मार्गदर्शन प्राप्त होता रहेगा. सादर.
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 31, 2015 at 12:39pm

आ० सुनील जी

इस पहलवानी से हाथ मिलाओगे तो फाइनल कट होगा ही . बहरहाल  आप की कहन अच्छी लगी . सादर .

कृपया ध्यान दे...

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