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ग़ज़ल (देखा है जब से आपको...)

देखा है जब से आपको हमने हिजाब में
लगता नहीं हमारा दिल अब किताब में

पी कर तुम्हरी आँख से महसूस यह किया
मस्ती न कुछ दिखी है खालिस शराब में

क्या तुमको मुझसे प्यार है पुछा था एक सवाल
मुस्कान लब पे रख दिया उसने जवाब में

शायद वो हमसे प्यार अब करने लगा जनाब
वो आप आप कहता है हमको खिताब में

मै क्यों न अपनी जान को तुम पर करू निसार
कयामत छुपी आपके "अलीम" शबाब में

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Comment by दुष्यंत सेवक on June 11, 2010 at 11:34am
wallah ...........dil par lagi aleem jee......khubsurat hai....yuva dilo ki bangi hai.....waah waahhh

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on June 9, 2010 at 8:32am
क्या तुमको मुझसे प्यार है पुछा था एक सवाल
मुस्कान लब पे रख दिया उसने जवाब में

बढ़िया है अलीम भाई , अच्छा लिख रहे है , उनको भी ओपन बुक्स ऑनलाइन ज्वाइन अब करा ही दीजिये , जिनको ध्यान मे रखकर आप ग़ज़ल कहते है, ज़रा वो भी तो पढें आपके ख्यालात को , बहुत बढ़िया ,
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on June 8, 2010 at 11:01pm
देखा है जब से आपको हमने हिजाब में
लगता नहीं हमारा दिल अब किताब में

waah aleem bhai waah....lekin aisa nahi karna hai kitab me bhi man lagana hai...
waise rachna bahut hi sundar hai...keep it up brother

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