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गजल- जान हो तुम मेरी जान लो जानेमन

212 212 212 212

एक है जान हम टुकडे दो जानेमन!
कैसे समझाए हम आपको जानेमन!!

हो नहीं सकते तुम दूर मुझसे कभी!
जान हो तुम मेरी जान लो जानेमन!!

तुम दुआ हो मेरी मेरे अरमान हो!
जिन्दगी बन्दगी तुम ही हो जानेमन!!

देख लूं जो तुझे साँस आ जाती है!
जाएँगे मर अगर तू न हो जानेमन!!

तुमको 'राहुल' पे अब भी यकीं गर नहीं!
चीर कर दिल मेरा देख लो जानेमन!!

मौलिक व अप्रकाशित!

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 17, 2015 at 7:16pm

जान-ए-मन का वज्न 212 सही है मैं गलत था.   

Comment by Rahul Dangi Panchal on January 17, 2015 at 7:09pm
आदरणीय गुमनाम जी व आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी सादर धन्यवाद! परन्तु सर एक उलझन सुलझाने का कष्ट करें!
सर मैने जान- ए- मन का वज्न २१२ लिया है जैसे दर्द-ए-दिल का ! क्रपया समझाए!

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 17, 2015 at 6:32pm

आदरणीय राहुल भाई ये एक आसान और मकबूल बह्र है. इसके लिए इतने लफ्ज़ आसानी से उपलब्ध है कि बहुत ज्यादा मात्रा गिराने की आवश्यकता ही नहीं है सादर 

Comment by gumnaam pithoragarhi on January 17, 2015 at 6:08pm
वाह खूब है सर ,,,,, सर एक शंका थी जानेमन की मात्रा गणना २१२ माफ़ करना समझ नहीं पाया
Comment by Alok Mittal on January 17, 2015 at 3:59pm

क्या बात बहुत सुंदर ग़ज़ल

Comment by Rahul Dangi Panchal on January 17, 2015 at 8:18am
आदरणीय एडमिन जी रचना को स्वीक्रती देने हेतु सादर धन्यवाद स्वीकार करें!

कृपया ध्यान दे...

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