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किसी खामोश बैठी शायरी से : ग़ज़ल (मिथिलेश वामनकर)

1222-1222-122

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अदावत क्या करे कोई किसी से
परेशां हर कोई जब ज़िन्दगी से

अकीदत आपकी सूरज से लेकिन
हमारी   बेरुखी  है  रौशनी  से

पसीना लफ्ज़ बनकर बह रहा है
किसी  खामोश  बैठी शायरी से

अता जिसको कभी शोहरत नहीं है
कहाँ  मिलते  है ऐसे  आदमी से

सदा सूरज के आगे क्यों सिमटती
किसी  ने  प्रश्न  पूछा चांदनी से

हुकूमत जुल्म किस पर कर रही है
सभी  खामोश  अपनी  बेबसी  से

नहीं  है  कौन  तेरा  तिश्नकामी
बचा  है  कौन  तेरी  तिश्नगी से

जरा मिथिलेश अब दिल से निकालो
मिटाया  नाम  जिसका डायरी  से

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(मौलिक व अप्रकाशित) -   © मिथिलेश वामनकर 
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Comment by gumnaam pithoragarhi on December 24, 2014 at 6:35pm


सदा सूरज के आगे क्यों सिमटती
किसी  ने  प्रश्न  पूछा चांदनी से

वाह सर अच्छी ग़ज़ल हुई है बधाई


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 24, 2014 at 5:48pm
आदरणीय खुर्शीद जी आपकी सराहना और प्रशंसा पर आनंदित हूँ आपका आभार हार्दिक धन्यवाद।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 24, 2014 at 5:46pm
आदरणीय श्याम वर्मा जी आपकी टिप्पणी पाकर ह्रदय आनंदित हो गया। बहुत बहुत आभार। हार्दिक धन्यवाद।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 24, 2014 at 5:41pm
आदरणीय डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव सर इस सराहना और स्नेह के लिए आभार। आपकी टिप्पणी सदैव रचनाकर्म के लिए प्रेरित करती है आपका बहुत बहुत धन्यवाद हार्दिक आभार।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 24, 2014 at 5:37pm
आदरणीय बागी सर आपकी सराहना और इतनी स्नेह पूर्ण सकारात्मक टिप्पणी पाकर अभिभूत हूँ आपका ह्रदय से आभार।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 24, 2014 at 5:33pm
आदरणीय सोमेश भाई आपका उत्साह वर्धन सदैव मुझे प्रेरित करता है। हार्दिक धन्यवाद।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 24, 2014 at 5:31pm
आदरणीया राजेश कुमारी जी आपके आशीर्वाद से सदैव इस रचनाकार का मनोबल बढ़ता है। आपका हार्दिक आभारी हूँ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 24, 2014 at 5:29pm
आदरणीय योगेन्द्र सिंह जी बहुत बहुत आभार धन्यवाद

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on December 24, 2014 at 5:28pm
आदरणीय गिरिराज सर आपका अनुमोदन पाकर प्रफुल्लित हूँ हार्दिक आभार।
Comment by khursheed khairadi on December 24, 2014 at 2:59pm

अकीदत आपकी सूरज से लेकिन

हमारी   बेरुखी  है  रौशनी  से

आदरणीय मिथिलेश जी अच्छी ग़ज़ल हुई है |सादर अभिनन्दन |

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