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उत्तर जहां से अब ..

हाय राम क्या करे जी कोई ...जवाब चाहिए

उत्तर जहां से अब तो कुछ लाजवाब चाहिए

लौकी आलू भिण्डी टमाटर लड़ते  हैं  बाजार में

इस दिवाली  हमको  ही इक खिताब चाहिए

पटाखों फुलझड़ी को देख बच्चे मचल रहे हैं

टूटी आस लिए वो पूछें कितने बेताब चाहिए

मजबूरियों में निःशब्द बाप आंसू बहा रहे हैं

फीकी जेब तेज हाट में माथों पर आब चाहिए

लड्डू बर्फ़ी रसगुल्ला हमसे यूँ  अब दूर हुए

मिश्री घोलें रिश्तों में मिठास बेहिसाब चाहिए

माटी का हो इक दिया ज्योति सदा जलती हो

गुड़ भोग से हमको बड़प्पन का रूआब चाहिए

किसी का रुपया हजार है..या लाखों बेकार है

सन्तुष्टि बख्से खुदा जो अब बेहिसाब चाहिए

इस दुनिया में अब  ऐसे भी मजाक हो रहे है

झोपड़ से पूछते  सब  तुझे क्या मेहराब चाहिए

"मौलिक व अप्रकाशित

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