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प्रीतम की गली.........
हर किसी के ज़िन्दगी में बसता है किसी के ख्वाबो का कारवां,

दूरियाँ मित जाती है मीट जाते है सारे शिकवे गीले,
हर किसी के धड़कन में होती है किसी की मुहब्बत जवां,

चाहतो का सैलाब लिए जब दो बदन हो एक मीले,
अपने प्रियवर के ख्वाब,को रोशन करे ऐ दिल की समां
उड़ चला जाता है ये मन इस दुनिया से दूर बहुत,

जहां प्रिय मिलन के मदहोश नसे में रहता हर पल दिल रमा,

जहां नेह प्रीत की पाकर पनपे अरमानो का जहां, उ

स राह के कांटे भी जब पैरो में चुभे तो फूल लगे,

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Comment by Sanjay Rajendraprasad Yadav on February 27, 2011 at 8:39pm
"वन्दना जी, और, गनेश जी,
आप दोनों जन को हमारी तरफ से स्नेह,अदब भरा नमस्कार....................
 कोई भूल हो तो छमा के पात्र समझना,गनेश जी मै मानता हूँ की मै जो भी लिखता हूँ उसमे बहुत कुछ शेष रह जाता है, मै कवी की हैसियत से कभी कुछ लिखा नहीं और ना लिख पाऊँगा, 
मेरे दिल के भावनाओं को वक्त के कुछ छड,और कुछ शब्द छू जाते है तो मै ऊपर-निचे कर के कुछ लिख देता हूँ !

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 26, 2011 at 9:49pm

जहां नेह प्रीत की पाकर पनपे अरमानो का जहां,

उस राह के कांटे भी जब पैरो में चुभे तो फूल लगे,

 

यह  रचना भी खुबसूरत है , बेहतरी की सम्भावना शेष , बधाई इस  प्रस्तुति पर

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