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माँ, बहन, बेटी के आँसू

 

माँ, बहन, बेटी के आँसू पे यहाँ रोता है दिल

रोज़ लुटती अस्मतें, क़त्लों का ग़म ढोता है दिल |

 

आबरू को उम्रदारों ने भी बदसूरत किया

मर्दों का बचपन भी है बदकार बद होता है दिल |

 

शाहो-साहब औ’ गँवारों सब में बद शह्वानीयत  

सब की आँखों में चढ़ा शर्मो-हया खोता है दिल |

 

है हुक़ूमत बेअसर बेख़ौफ़ हैं ज़ुल्मो-ज़बर  

हर घड़ी हर साँस जैसे ख़ार पे सोता है दिल |

 

आज भी शै की तरह हैं घर या बाहर औरतें

बेरहम इंसाफ़ भी तेज़ाब से धोता है दिल |

 

 

(मौलिक व अप्रकाशित)

-- संतलाल करुण 

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Comment

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Comment by Santlal Karun on September 7, 2014 at 3:26pm

आदरणीया सुनीता दोहरे जी,

ग़ज़ल आप को अच्छी लगी, आप के मन के प्रतिक्रियात्मक भावों के प्रति हार्दिक आभार !

Comment by sunita dohare on September 5, 2014 at 4:28pm

बेहतरीन ग़ज़ल ,हर शेर दिल के करीब पँहुचा, बहुत बहुत बधाई आपको !!!

Comment by Santlal Karun on August 21, 2014 at 7:37pm

आदरणीय डॉ. आशुतोष मिश्र जी,

ग़ज़ल के प्रति आप की रुचि और प्रशंसा के लिए सहृदय आभार ! 

Comment by Santlal Karun on August 21, 2014 at 7:36pm

आदरणीया वेदिका जी,

ग़ज़ल पढ़ने और तारीफ़ के लिए सहृदय आभार !

Comment by Santlal Karun on August 21, 2014 at 7:34pm

आदरणीय जे.एल. सिंह जी,

सम्मान को लेकर आप की प्रसन्नता के प्रति सहृदय आभार !

Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 21, 2014 at 10:36am

इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए मेरी तरफ से हार्दिक शुभकामनायें सादर बधाई के साथ 

Comment by वेदिका on August 19, 2014 at 9:39pm
गजल का हर शेर दुःख दर्द संवेदना से ओतप्रोत है। सामयिक रचना पर बधाई स्वीकारें
सादर!!
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on August 19, 2014 at 9:32pm

आदरणीय श्री संतलाल जी, सादर अभिवादन!

वैसे तो मैं आपकी उच्चकोटि रचनाओं से पहले से प्रभावित हूँ और आपका प्रशंशक रहा हूँ. इस सम्मान के लिए आपको हृदयतल से बधाई! उम्मीद है आप आगे भी अच्छी रचनाएँ देते रहेंगे. सादर 

Comment by Santlal Karun on August 10, 2014 at 10:28pm

आदरणीय गणेश बागी जी,

ओबीओ द्वारा 'माँ, बहन, बेटी के आँसू' को महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना घोषित किए जाने के प्रति सहृदय सद्भावनाएँ व्यक्त करता हूँ | उक्त ग़ज़ल ने आप और निर्णायकों के मन को गहराई तक छू लिया है, जानकर बड़ी खुशी हुई | मुझे इस मंच पर आने के लिए हमारे संगठन की शिक्षिका श्रीमती मंजरी पाण्डेय ने प्रेरित किया था | उसके पहले मैं ओबीओ से परिचित नहीं था | व्यस्तता के कारण लिखने-पढ़ने का कार्य अधिक नहीं हो पाता, किन्तु जितना कुछ व्यस्तता में भी दबाए नहीं दबता और हृदयतल से बाहर आ जाता है, उसे प्रकाश में लाने के लिए ओबीओ और उसके जैसे मंचों का आभार मानता हूँ | ओबीओ पर आए मुझे अधिक समय नहीं हुआ तथा इस मंच पर अधिक रचनाएँ भी न प्रकाशित कर पाया, फिर भी यह सम्मान प्रदान किया गया है, जिससे ओबीओ के प्रति मेरे हृदय में निष्ठा और आदर का भाव और भी बढ़ गया है | ... पुन: हृदयपूर्वक सद्भावनाएँ !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on July 31, 2014 at 8:45pm

बेहतरीन ग़ज़ल ,हर शेर दिल के करीब पँहुचा ,थे दिल से दाद कबूलें आ० संतलाल जी 

कृपया ध्यान दे...

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