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सूरज भी आ गया था आशिकी के दांव में..

कल घूमने गया था समंदर के गांव में,
हिचकोलियां खाती रही कश्ती बहाव में।
 
निकले उधर से जब वो समंदर ठहर गया,
तूफान खुद सवार थे उनकी नाव में।
 
सूरत को क्या बयां करूं वो हुस्न नूर था,
नजरें थीं आसमान पर इतना गुरूर था,
 
पायल कि वो झनकार सुन रहा हूं आज तक,
जादूगरी थी ऐसी कोई उसके पांव में।
 
थे होंठ सुर्ख और बदन मरमरी सा था,
था रूप कोई अप्सरा का या परी का था,
 
जुल्फों में घटाएं थीं चेहरे पे धूप थी,
सूरज भी आ गया था आशिकी के दांव में।।
  
-  मौलिक व अप्रकाशित   - अतुल कुमार

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Comment

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Comment by atul kushwah on October 28, 2014 at 11:16pm

आदरणीय सोमेश जी, सराहनीय प्रतिक्रिया के लिए हृदयतल से आभार। लेकिन मैं अभी प्रशिक्षु हूं, प्रशंसा भला किसे नहीं अच्छी लगती, मगर जो स्नेह आपसे मिला, शायद उतना ज्यादा उत्कृष्ट रचनाकर्म अभी नहीं हो पाया है, इन तोतले प्रयासों को आशीष देते रहें। सादर— अतुल

Comment by somesh kumar on October 28, 2014 at 11:08pm

aap ki smst gzle hridya-sprshi hain ,nishndeh aap ek acche gzlkaar ki yogyta rkhte hain \saari gzlon ke lie bdhai


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on June 25, 2014 at 4:28pm

बहुत सुन्दर कोमल प्रस्तुति है आ० अतुल कुशवाहा जी 

इसे ग़ज़ल के शिल्प में ही ढालना था ना,,चार चाँद लग जाते.

इस प्रस्तुति पर मेरे बहुत बहुत बधाई स्वीकारिये 

Comment by atul kushwah on June 20, 2014 at 5:29pm

आ.गिरिराज सर, आशीष देते रहें। सादर—अतुल


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on June 19, 2014 at 10:17pm

आदरणीय अतुल भाई , सुन्दर भाव पूर्ण द्विपदियों के लिये आपको बधाइयाँ ॥

Comment by atul kushwah on June 19, 2014 at 8:12pm

आ. महिमा श्री जी, प्रतिक्रिया के लिए आभार। सादर— अतुल

Comment by atul kushwah on June 19, 2014 at 8:10pm

आ.कूंटी जी, आपकी प्रतिक्रिया पढकर बहुत अच्छा लगा। सादर

Comment by atul kushwah on June 19, 2014 at 8:09pm

आ.मीना जी, स्नेह और आशीष के लिए आभार। सादर

Comment by atul kushwah on June 19, 2014 at 8:08pm

आदरणीय नरेन्द्रसिंह जी, उत्साहवर्धन के लिए आभार। सादर— अतुल

Comment by atul kushwah on June 19, 2014 at 8:06pm

आदरणीय डॉ. गोपाल नारायन सर, प्रतिक्रिया के लिए आभार। आशीष देते रहिए। सादर—अतुल

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