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मेरी त्रिवेनियाँ...

 

 

 1 .  एक को समझाऊँ तो दूसरी रोने लगती है ,
       थक -सा गया हूँ सबको मनाते मनाते ,
       
       ये तमन्नाओं का कटोरा कभी भरता ही नहीं |
 
2 .   मैंने छिपा लिया उन्हें मुट्ठियों में मोती समझकर ,
       तुमने पोंछ दिया हथेली से पानी कहकर ,
      
       या खुदा ! आंसूओं का मुकद्दर भी जुदा-जुदा होता है ?
 
3 .  ना जाने क्या चुभता रहा रात भर आँखों में ,
      मसलते मसलते लाल हो गईं आँखें मेरी ,
      
      सुबह धोईं जो शबनम से बूंदों के साथ चाँद निकला | 
 
4 .  तेरे लिए अग़र बाँध भी दूं सागर को ,
      क्या मिलेगा इन बेकाबू जज़्बातों को कैद कर ,
      
      दरवाज़े से टकराकर लहरें शोर मचाती रहेंगी  |
 
5 .  जाऊं कितना भी दूर तुमसे किसी भी दिशा में ,
      टकरा ही जाता हूँ किसी ना किसी मोड़ पर ,
     
      सच ही कहा है, किसी ने  कि दुनिया गोल है  |
 
6 .  कुछ अरसे पहले तेरे हाथों कि खुशबु रह गई थी हर जगह ,
      वही महक , महकती रहती है आज भी , लफ़्ज़ों में ,
    
      डायरी के पन्नों में बसी यादें अब भी गीली हैं |

Views: 532

Comment

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Comment by Veerendra Jain on February 15, 2011 at 11:21pm
Bahut bahut shukriya...Anushri...
Comment by Veerendra Jain on February 15, 2011 at 11:20pm
Arun ji... bahut bahut dhanyawad...aap logon ka protsahan ek gazab ki shakti pradaan karta hai...
Comment by Veerendra Jain on February 15, 2011 at 11:19pm
Vandana ji...bahut bahut aabhar..ki aapne rachna pasand ki aur use charchamanch per feature kiya...itni hausla afzai ke liye bahut shukriya...
Comment by anupama shrivastava[anu shri] on February 15, 2011 at 12:04pm
मैंने छिपा लिया उन्हें मुट्ठियों में मोती समझकर ,
तुमने पोंछ दिया हथेली से पानी कहकर ,

या खुदा ! आंसूओं का मुकद्दर भी जुदा-जुदा होता है ?.bahut khoob likha hai...............badhaiyan.......
Comment by Abhinav Arun on February 13, 2011 at 11:37am

सचमुच मौलिक और गज़ब की त्रिवेनियाँ ..एक से बढ़कर एक ..मुझे ये खास पसंद आयी ..

 ना जाने क्या चुभता रहा रात भर आँखों में ,

      मसलते मसलते लाल हो गईं आँखें मेरी ,
      
      सुबह धोईं जो शबनम से बूंदों के साथ चाँद निकला | 
बधाई कबूलें

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