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आखिर, कितने दिनों के वास्ते ?

खिलना नहीं है बाग में

मिलना है जिसको खाक में

ध्यान में उसका धरूँ

कितने दिनों के वास्ते ?

विश्वास अपनों का धरूँ

उपहास अपना क्यों करूँ ?

इतिहास अपना ही लिखूँ

कितने दिनों के वास्ते ?

अवसाद सपनों पर करूँ

फरियाद अपनों से करूँ

नित याद में खोई रहूँ

कितने दिनों के वास्ते ?

अभिमान मन की भूल है 

अरमान मन की चूक है

इस चूक को वरदान समझूँ

कितने दिनों के वास्ते ?

आगोश मैं उसकी चुनूँ 

खामोश मैं उसमें रहूँ

जो है सदा ही शाश्वत

मैं चलूँ, चलती रहूँ 

चुन लूँ उसी के रास्ते

जी लूँ उसी के वास्ते। 

कल्पना मिश्रा बाजपेई

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Meena Pathak on April 10, 2014 at 4:47pm

बहुत सुन्दर गीत .. बहुत मनभाई ... बहुत बहुत बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 10, 2014 at 4:33pm

आदरणीया कल्पना जी , सुन्दर गीत रचना के लिये बधाइयाँ ॥

Comment by kalpna mishra bajpai on April 10, 2014 at 4:11pm

आ० सचिन देव जी आभार आपका !

Comment by kalpna mishra bajpai on April 10, 2014 at 4:10pm

आ० अन्नपूर्णा दी आभार आप का /सादर 

Comment by kalpna mishra bajpai on April 10, 2014 at 4:09pm

आ० जितेन्द्र भाई दिल से आभारी हूँ

Comment by Sachin Dev on April 10, 2014 at 2:37pm

आदरणीय कल्पना मिश्रा बाजपेई जी, इस उत्कृष्ट रचना के लिए हार्दिक बधाई आपको ! 

Comment by annapurna bajpai on April 10, 2014 at 2:18pm

सुंदर रचना , कल्पना जी बधाई आपको । 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on April 10, 2014 at 11:56am

बहुत सुंदर, कोमल भावों से पूर्ण रचना बधाई स्वीकारें आदरणीया कल्पना मिश्र जी

Comment by kalpna mishra bajpai on April 9, 2014 at 3:16pm

आदरनिया गीतिका 'वेदिका' जी "इस चूक को वरदान समझूँ" सिर्फ इस पंक्ति का अर्थ समझना मुश्किल है लेकिन नीचे दी गई पंक्तियों के साथ पढ़ी जाएँ तो मुझे लगता है अर्थ समझ में आएगा । आभारी हूँ कि आपने रचना को समय दिया॥    

अभिमान मन की भूल है 

अरमान मन की चूक है

Comment by kalpna mishra bajpai on April 9, 2014 at 3:05pm

अदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी आपकी आभारी हूँ !

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