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तीन दोहे (अन्नपूर्णा बाजपेई)

क्षण भंगुर जीवन हुआ, जीवन का क्या मोल ।

भज लो तुम भगवान को, क्यों रहे विष घोल ।। 

बंद पड़ी सब  खिड़कियाँ, चाहे तो लो खोल ।

खुले हुये अंबर तले, कर लो अब किल्लोल ॥ 

* भामा माया मोहिनी, मोहति रूप अनेक ।

   माया माला भरमनी, फंसत नाहीं नेक ॥

*इस दोहे को इस तरह भी देखें :- 

ऐसी माया मोहिनी मोहती  रूप अनेक ।

केवल माला फेर के कोई न बनता नेक ॥ 

संशोधित 

अप्रकाशित एवं मौलिक

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Comment by annapurna bajpai on January 30, 2014 at 5:03pm

आ0वंदना जी आपका आभार ।

Comment by annapurna bajpai on January 30, 2014 at 5:02pm

आ0 राजेश कुमारी जी दोहे पसंद करने के लिए आपका हार्दिक आभार। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 30, 2014 at 3:55pm

आदरणीया अन्नपूरणा जी , दोहों के जीवन दर्शन बहुत सुन्दर लगे , आपको बधाइयाँ ॥

Comment by pawan amba on January 30, 2014 at 1:18pm

सुन्दर दोहे,

Comment by vandana on January 30, 2014 at 7:11am

सुन्दर भावपूर्ण !!! आदरणीया अन्नपूर्णा जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 29, 2014 at 7:47pm

सुन्दर सात्विक दोहे ...बहुत बहुत बधाई 

Comment by annapurna bajpai on January 29, 2014 at 6:47pm

आदरणीय श्याम नारायन जी , आ० मीना दी , आ० कुंती दीदी , आ० अनीता जी आप सभी का हार्दिक आभार । 

Comment by Anita Maurya on January 29, 2014 at 5:04pm

बहुत सुन्दर दोहे, बधाई आपको। 

Comment by coontee mukerji on January 29, 2014 at 3:42pm

आपकी रचना का भाव बहुत सुंदर है.अन्नपूर्णा जी. हार्दिक बधाई.

Comment by Meena Pathak on January 29, 2014 at 1:52pm

बधाई अन्नपूर्णा जी बधाई 

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