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स्कूल के कुछ दोस्त मिलकर घर में पड़े पुराने कम्बल गरीबों में बाँटने को निकले। कम्बल बाँट कर वे ज्यों ही वापस चलने को हुए, एक बुजुर्ग ने आवाज़ लगाई ………

"बबुआ जी तनिक सुनो"

"जी बाबा, आपको तो कम्बल दे दिया न ?"

"जी बबुआ जी, कम्बल तो दिया और फिर आप लोग ऐसे ही चल दिए"
"ऐसे ही चल दिए मतलब ?"

"बबुआ जी, पिछले तीन दिन से चमचमाती गाड़ियों में साहब लोग आते हैं, कम्बल बाँट कर फ़ोटो खिचवाते हैं और फिर २०-२० रूपया देकर कम्बल वापस ……… "

(मौलिक व अप्रकाशित)

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 24, 2013 at 9:49am

प्रतिक्रिया हेतु आभार आदरणीया सविता मिश्रा जी |


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 24, 2013 at 9:48am

लघुकथा पर आपकी उपस्थिति और सराहना बहुत ही उत्साहवर्धन करती है, बहुत बहुत आभार आदरणीय गिरिराज भाई साहब |

Comment by SALIM RAZA REWA on December 24, 2013 at 9:06am

आदरणीय इंजीनियर साहब ..
कितनी छोटी कहानी मे कितना बड़ी बात हो गई है ..."बबुआ जी, पिछले तीन दिन से चमचमाती गाड़ियों में साहब लोग आते हैं, कम्बल बाँट कर फ़ोटो खिचवाते हैं और फिर २०-२० रूपया देकर कम्बल वापस ……… " दिल को छू गई ...दिली मुबारकबाद ..

Comment by वीनस केसरी on December 24, 2013 at 12:30am

छा गए भाई
जय हो

Comment by savitamishra on December 24, 2013 at 12:09am

शायद सच्चाई यही हो ..सुन्दर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 23, 2013 at 10:31pm

आदरणीय गणेश भाई , समाज में गरीबों के तथा कथित हिमायती कैसे काम कर रहे है , आपने बहुत अच्छे से लघुकता के माध्यम से बताया है ॥ सुन्दर लघु कथा के लिये आपको अनेकों बधाइयाँ ॥

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