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क्यों चले आए शहर (नवगीत) - कल्पना रामानी

क्यों चले आए शहर, बोलो 

श्रमिक क्यों गाँव छोड़ा?

 

पालने की नेह डोरी,  

को भुलाकर आ गए।

रेशमी ऋतुओं की लोरी,

को रुलाकर आ गए।

 

छान-छप्पर छोड़ आए,

गेह का दिल तोड़ आए,

सोच लो क्या पा लिया है,

और  क्या सामान जोड़ा?

 

छोडकर पगडंडियाँ

पाषाण पथ अपना लिया।

गंध माटी भूलकर,

साँसों भरी दूषित हवा।

 

प्रीत सपनों से लगाकर,

पीठ अपनों को दिखाकर,

नूर जिन नयनों के थे, क्यों

नीर उनका ही निचोड़ा?    

 

है उधर आँगन अकेला,

और तुम तन्हा इधर।

पूछती हर रहगुज़र है,

अब तुम्हें जाना किधर।

 

राज जिनसे मिला चोखा,

क्यों  उन्हें ही दिया  धोखा?

विष पिलाया विरह का,

वादों का अमृत घोल थोड़ा।

 

भूल बैठे बाग, अंबुआ

की झुकी वे डालियाँ।

राह तकते खेत, गेहूँ

की सुनहरी बालियाँ।

 

त्यागकर हल-बैल-बक्खर,

तोड़ते हो आज पत्थर,

सब्र करते तो समय का,

झेलते क्यों क्रूर कोड़ा?

मौलिक व अप्रकाशित

कल्पना रामानी

Views: 1136

Comment

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Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on December 18, 2013 at 6:26pm

क्या खूबसूरत नवगीत...

सादर बधाई स्वीकारें आदरणीया कल्पना रामानी जी...

Comment by राजेश 'मृदु' on December 18, 2013 at 5:02pm

आपकी टिप्‍पणी के बाद अब सबकुछ स्‍पष्‍ट हो गया है आदरणीय कल्‍पना दी, सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on December 18, 2013 at 4:22pm

अपनी मिट्टी अपने गाँव को छोड़, शहर को पलायन कर जाने वाले एक श्रमिक से बहुत सुन्दर मर्मस्पर्शी सवाल करता बहुत खूबसूरत नवगीत आदरणीया कल्पना जी 

बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें 

Comment by coontee mukerji on December 17, 2013 at 11:06pm

है उधर आँगन अकेला,

तुम हो एकाकी इधर।

पूछती हर रहगुज़र है,

अब तुम्हें जाना किधर।

 

जिनसे पाया राज चोखा,

दे दिया उनको ही धोखा,

विष पिलाया विरह का,

वादों का अमृत घोल थोड़ा.........अति सुंदर.

Comment by कल्पना रामानी on December 17, 2013 at 10:25pm

आदरणीय सुशील जी, उत्साहवर्धन करती हुई टिप्पणी के लिए हृदय से आभार

Comment by कल्पना रामानी on December 17, 2013 at 10:23pm

आदरणीय गोपाल नारायण जी, बहुत बहुत धन्यवाद

सादर

Comment by कल्पना रामानी on December 17, 2013 at 10:22pm

मीना जी सादर धन्यवाद

Comment by कल्पना रामानी on December 17, 2013 at 10:21pm

वीनस जी, आपका रचना पर आना और सराहना अच्छा लगा। हार्दिक धन्यवाद

Comment by कल्पना रामानी on December 17, 2013 at 10:20pm

अदरणीय गिरिराज जी बहुत बहुत धन्यवाद

Comment by कल्पना रामानी on December 17, 2013 at 10:19pm

आदरणीय तपन जी,प्रोत्साहित करने के लिए  सादर धन्यवाद

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