For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

भिखारिन (हास्य व्यंग्य) अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव

छोटे शहर में ब्याही गईं, कुछ महानगर की लड़कियाँ।                   

जींस टॉप लेकर आईं, ससुराल में अपनी लड़कियाँ।।                   

 

बहुयें सभी बन गई सहेली, मुलाकातें भी होती रहीं।     

जींस-टॉप में पहुँच गईं, एक उत्सव में बहू बेटियाँ॥

 

सास -   ससुर नाराज हुए, पति देव बहुत शर्मिंदा हुए।                           

भिखारियों को घर पे बुलाए, साथ थी उनकी बेटियाँ।।

 

बड़ी देर तक समझाये फिर, जींस पेंट और टॉप दिये।                                                         

खुश हुये भिखारी और बोले, पहनेंगी हमारी बे़टियाँ।।                   

 

जींस पहन झोला लटकाये, घूम रहीं हैं युवा भिखारिन।                                            

मुड़ - मुड़कर देखें सब कोई, वृद्ध युवक और युव़तियाँ।।                              

 

भीख माँगती जींस पहनकर, मनचले सीटी बजाते हैं।                          

पैसे ज़्यादा मिलने से, खुश रहतीं भिखारिन बेटियाँ।।  

************************************************** 

-अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव, धमतरी(छत्तीसगढ़)

 

  (मौलिक एवं अप्रकाशित)

                      

 

Views: 1637

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by विजय मिश्र on November 28, 2013 at 10:48am
राजेशजी , नमस्कार !
बाजारू से अभिप्राय कि यह टिकाऊ है , दाम के अनुपात में इसका LONGEVITY ,DURABILITY बहुत ज्यादा है ,MAINTENANCE की जरूरत नहीं ,ROUGH -TOUGH है , सस्ता और पहनने में आसान भी है ,इसलिए लोग खरीदते हैं और आरामदेह न होते हुए भी लोग इसे पहनते हैं,भारत के अतिशितोष्ण जलवायु में यह उपयुक्त नहीं है,यह परिधान की श्रेणी में नहीं लाया जा सकता ,इसलिए बाजारू है | बाजारवाद शव्द से मतलब कि इसे आजके दिन STATUS SYMBOL बना दिया गया है ,श्रमिकों की जगह सभ्य समाज भी इसे पहनने लगा है और अब इसे कई COST RANGE में BRANDED PRODUCT का शक्ल देकर अच्छी कीमत तसीला जा रहा है | जिस तरह से इस कविता पर विवाद उठा है ,मैं उससे भिन्न हूँ और पहनने-ओढने को फुहरपन से जोड़ कर नहीं देखता | धन्यवाद और कोई प्रश्न हो तो आमंत्रित |
Comment by Kapish Chandra Shrivastava on November 28, 2013 at 9:22am

आदरणीय बड़े भाई , क्षमा कीजिएगा ,  व्यक्ति के पहनावे अथवा व्यक्तित्व में समय और काल  के अनुसार  परिवर्तन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है | और इस क्रिया में लिंग का कोई भेद नहीं रहा है | नहीं तो हम और आप आज भी अपना शशीर पत्ते और जानवर के चमड़े से ढक रहे होते | पुरुषो एवं लड़को  का लड़कियों जैसे कान में बाली पहनना , ब्यूटी पार्लर जाना और सौन्दर्य प्रसाधनों का उपयोग करना ,  धोती कुरता से बढ़ते बढ़ते अंग्रेजों की नक़ल -  आयातीत परिधान पेंट शर्ट और जींस पहनना तो हमें स्वीकार है , पर स्त्रियों और  " बेटियों " का नहीं ,  |   यह तो हम पुरोषों की ही ओछी और रुग्ण मानसिकता का परिचायक है | जो हम कपड़ों में  झाँक कर महिलाओं के स्वाभाव और वक्तित्व का आकलन करने  की कोशिश करते हैं | आपकी यह रचना हास्य अथवा व्यंग के बदले व्यक्तिगत भड़ास जादा लगती है | साहित्य के  दृष्टिकोण से भी समझना मुश्किल है की यह गद्य है अथवा पद्य , कविता है या अकविता , शब्दों और वाक्यों का विन्यास भी बहुत कमजोर है | 

Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on November 28, 2013 at 12:14am
कविता अपने प्रयोज्यों का सम्मान करती प्रतीत नही होती
न हीं कोई सार्थक सामाजिक व्यंग्य सामने आया।
सादर
Comment by annapurna bajpai on November 28, 2013 at 12:09am

आ0 अखिलेश जी यह तो साहित्यिक मंच है । इस पर आपकी इस रचना ने  किसी पहनावे विशेष को ही इंगित नहीं किया आपने वरन  स्त्री वर्ग को भी इंगित किया है जो  कि ठेस पहुंचा रहा है , मै नीचे कुछ लोगों को छोड़ कर सभी से सहमत हूँ । शायद आपकी रचना सुंदर संदेश देने मे नाकाम लग रही है । 

Comment by वेदिका on November 27, 2013 at 11:41pm

रचना के लिए नया विषय लिया है, खैर रचना के लिए और भी कई सामाजिक मुद्दे हो सकते थे जो कोई सार्थक संदेश देते|  रचना का संदेश भी समझ नहीं आ रहा| क्या कहना चाहती है रचना? यदि हमारी बेटियाँ कुछ रिजेक्ट करती हैं तो भिखारियों की बेटियाँ कैसे उसके योग्य हो सकती हैं? वे भी तो बेटियाँ है न आखिर!   खैर...

रचना के शीर्षक की बात की जाए तो "भिखारिन" कहेंगे या "जींस टॉप का विरोध"? यदि आप विरोध कर भी रहे है इसका तो लिंगभेद के समानुपात मे न करके सबके लिए करते तो शायद रचना व्यापक हो जाती|

सादर !!

Comment by ram shiromani pathak on November 27, 2013 at 11:35pm

आदरणीय आपकी  इस  रचना  से  मुझे बहुत निराशा हुई। ……।कथ्य ,शिल्प,भाव किसी भी स्तर से मुझे रचना नहीं पसंद आयी।  क्षमा सहित। ।सादर 

Comment by Richa on November 27, 2013 at 10:32pm
I agree with meena ji and Rajesh kumari ji..kisi bhi pahnawe me koi dosh nahi hota...dosh aur gandagi insaan ki soch me hoti hai...Droupadi ka cheer haran saree me hi hua tha:)

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 27, 2013 at 9:07pm

आदरणीय विजय मिश्र जी पोशाक बाजारू से आपका क्या तात्पर्य है ??


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on November 27, 2013 at 9:05pm

आदरणीय मीना पाठक जी की बात का समर्थन मैं भी करती हूँ ना जाने क्यों आपकी  इस व्यंगात्मक रचना में पहनावे के मजाक की बू आ रही है, सच पूछो तो जितना बदन लड़कियों या नारियों का जींस टाप में ढका होता है उतना भारतीय नारी परिधान साडी में भी नहीं होता,समझ नहीं आता इस पहनावे को लेकर पुरुष वर्ग को इतनी आपत्ति क्यों है,दोष पहनावे में नहीं लोगों की सोच में है   

Comment by Meena Pathak on November 27, 2013 at 8:05pm

आदरणीय अखिलेश जी आप ने जिन कपड़ो का मजाक बनाया है वही आज कल सभी लड़कियाँ पहनती हैं और खरीद कर भी हम और आप ही देते हैं फिर इतनी आपत्ति क्यों जींस टॉप से | क्षमा कीजियेगा आदरणीय मुझे अच्छा नही लगा आप का यूँ लड़कियों के पहनावे का मजाक बनाना ..

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
7 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
11 hours ago
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
21 hours ago
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
yesterday
Sushil Sarna posted blog posts
yesterday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रामबली गुप्ता's blog post कर्मवीर
"कर्मवीरों के ऊपर आपकी छांदसिक अभिव्यक्ति का स्वागत है, आदरणीय रामबली गुप्त जी.  मनहरण…"
Tuesday
Jaihind Raipuri posted a blog post

ग़ज़ल

2122    1212    22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत मेंक्या से क्या हो गए महब्बत में मैं ख़यालों में आ गया उस…See More
Tuesday
Jaihind Raipuri commented on Admin's group आंचलिक साहित्य
"कुंडलिया छत्तीसगढ़ी छत्तीसगढ़ी ह भाखा, सरल ऐकर बिधान सहजता से बोल सके, लइका अऊ सियान लइका अऊ…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service