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उसकी बातों पे मुझे आज यकीं कुछ कम है
ये अलग है कि वो चर्चे में नहीं कुछ कम है

जबसे दो चार नए पंख लगे हैं उगने
तबसे कहता है कि ये सारी ज़मीं कुछ कम है

मैं ये कहता हूँ कि तुम गौर से देखो तो सही
जो जियादा है जहां वो ही वहीँ कुछ कम है

मुल्क तो दूर की बात अपने ही घर में देखो
'कहीं कुछ चीज जियादा है कहीं कुछ कम है'

देख कर जलवा ए रुख आज वही दंग हुए
जो थे कहते तेरा महबूब हसीं कुछ कम है

कुछ तो अनबन है ज़रूर उसकी, खुदा से 'राणा'
आज सजदे में झुकी उसकी ज़बीं कुछ कम है

मौलिक तथा अप्रकाशित

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on November 13, 2013 at 8:01am

आदरणीया सविता मिश्रा जी ग़ज़ल पर समय देने के लिए शुक्रिया|


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on November 13, 2013 at 7:59am

आदरणीया अन्नपूर्णा जी ग़ज़ल पसंद करने के लिए आभार|


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on November 13, 2013 at 7:59am

आदरणीय अरुण शर्मा अनंत जी ग़ज़ल पसंद करने के लिए आभार|


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on November 13, 2013 at 7:58am

आदरणीय सुशील जोशी जी ग़ज़ल पसंद करने के लिए शुक्रिया|


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on November 13, 2013 at 7:57am

आदरणीया डा. प्राची सिंह जी, आप जैसे रचनाधर्मी ने मेरे रचना कर्म को मान दिया यही मेरा पुरस्कार है| तहे दिल से शुक्रिया|


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on November 13, 2013 at 7:54am

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी नवाजिशों के लिए शुक्रिया|


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on November 13, 2013 at 7:52am
आदरणीय सौरभ जी ज़र्रे को आफताब करना कोई आपसे सीखे......:-)तहे दिल से शुक्रिया|

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on November 13, 2013 at 7:49am
आदरणीय डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव जी रचना पर समय देने हेतु आभार|

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on November 13, 2013 at 7:47am
आदरणीय राम अवध विश्वकर्मा जी आपने ग़ज़ल पर समय दिया और मेरा उत्साहवर्धन किया इस लिए तहे दिल से शुक्रिया|

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on November 13, 2013 at 7:46am
शिज्जू जी आपने शेर पसंद किया, आभारी हूँ|

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