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मैं लेटा हूँ घास पर / सूखी भूरी घास 

जिसके होने का एहसास भर है

 

जमीन गरम है

लेकिन लेटा हूँ 

धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी

तपन की अनुभूति

 

उड़े जा रहे हैं

पंछी एक ओर 

शरीर के नीचे

रेंगती चींटियाँ 

पास ही खेलते कुछ बच्चे 

कुछ लोग भी

इधर-उधर छितरे, घूमते-बैठे

 

मैं निरपेक्ष

लेटा तकता आसमान

कि कभी टूटकर गिरेगा

और धरती का

रंग बदल जाएगा

                - बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by बृजेश नीरज on October 25, 2013 at 7:13pm

आदरणीय सुशील जी आपका हार्दिक आभार! आपका अनुमोदन बहुत महत्वपूर्ण है!


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Comment by गिरिराज भंडारी on October 25, 2013 at 6:07pm

आदरणीय बृजेश भाई , आंतरिक व्यथाओं के बावज़ूद कहीं उमीद की किरण अभी भी बाक़ी है !!! बहुत सुन्दर प्रस्तुति , आपको बधाई !!!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on October 25, 2013 at 5:06pm

बहुत अच्छी प्रस्तुति आदरणीय बृजेश जी दाद कुबूल करें

Comment by ram shiromani pathak on October 25, 2013 at 4:54pm

अनुपम प्रस्तुति आदरणीय भाई बृजेश जी //हार्दिक बधाई आपको

ये पंक्तियाँ बहुत ही अच्छी लगीं। ...

उड़े जा रहे हैं

पंछी एक ओर 

शरीर के नीचे

रेंगती चींटियाँ 

पास ही खेलते कुछ बच्चे 

कुछ लोग भी

इधर-उधर छितरे, घूमते-बैठे

 

मैं निरपेक्ष

लेटा तकता आसमान

कि कभी टूटकर गिरेगा

और धरती का

रंग बदल जाएगा

                -

Comment by अरुन 'अनन्त' on October 25, 2013 at 3:52pm

आदरणीय बृजेश भाई जी आपकी गहन सोच जिस सुन्दरता से रचनाओं में उभर कर आती है वह अत्यंत सराहनीय है बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय बहुत बहुत बधाई स्वीकारें

Comment by Meena Pathak on October 25, 2013 at 2:48pm

मैं निरपेक्ष

लेटा तकता आसमान

कि कभी टूटकर गिरेगा

और धरती का

रंग बदल जाएगा.............. आप की कलम को नमन , बहुत बहुत बधाई आप को 

Comment by Saarthi Baidyanath on October 25, 2013 at 2:40pm

रचना का सार ...  अंतर्मन में घूमते उमड़ते ज़ज्बातों की  अच्छी बयानगी कर रहा है ! कुल मिलकर ...उम्दा रचना !..नमन :)

कि कभी टूटकर गिरेगा

और धरती का

रंग बदल जाएगा.....! वाह ..उत्तम...!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 25, 2013 at 9:23am

मैं निरपेक्ष

लेटा तकता आसमान

कि कभी टूटकर गिरेगा

और धरती का

रंग बदल जाएगा

बेहद गहन भाव, अनुपम रचना, बहुत बहुत बधाई आदरणीय बृजेश जी

Comment by Sushil.Joshi on October 25, 2013 at 5:44am

बहुत सुंदर रचना है आ0 बृजेश जी..... अवश्य ही... आज नहीं तो कल एक ऐसा वक्त आएगा जब आपकी इस रचना के भाव हक़ीकत बन कर सामने होंगे...... अवश्य ही होगा यह बदलाव....... हार्दिक बधाई इस प्रस्तुति हेतु....

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