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मैं लेटा हूँ घास पर / सूखी भूरी घास 

जिसके होने का एहसास भर है

 

जमीन गरम है

लेकिन लेटा हूँ 

धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी

तपन की अनुभूति

 

उड़े जा रहे हैं

पंछी एक ओर 

शरीर के नीचे

रेंगती चींटियाँ 

पास ही खेलते कुछ बच्चे 

कुछ लोग भी

इधर-उधर छितरे, घूमते-बैठे

 

मैं निरपेक्ष

लेटा तकता आसमान

कि कभी टूटकर गिरेगा

और धरती का

रंग बदल जाएगा

                - बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by बृजेश नीरज on October 30, 2013 at 5:49pm

आदरणीय राहुल भाई आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on October 30, 2013 at 5:49pm

आदरणीया प्राची जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on October 30, 2013 at 5:48pm

आदरणीय रमेश जी आपका हार्दिक आभार!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 30, 2013 at 10:54am

यूं ही घास पर लेट घास की धड़कन सुनना ..या दरख्त से लिपट उसके सपन्दनों में एक हो जाना, या अनंत आसमान में यूं ही खो जाना...या ऐसा ही बहुत कुछ.................. यहीं से जन्मता है मन में एक सच, समझ आता है दीखता है वो खूबसूरत सच..

ऐसे ही एक खामोश सच को जीते सी ये प्रस्तुति बहुत सुन्दर लगी आदरणीय बृजेश जी 

हार्दिक शुभकामनाएं 

Comment by रमेश कुमार चौहान on October 27, 2013 at 6:21pm

इस सुंदर रचना के लिये आदरणीय नीरजजी आपको बधाई

Comment by बृजेश नीरज on October 27, 2013 at 12:46am

आदरणीय विशाल जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on October 27, 2013 at 12:45am

आदरणीय निकोर साहब आपका हार्दिक आभार!

Comment by VISHAAL CHARCHCHIT on October 26, 2013 at 11:21pm

बहुत ही सुन्दर कल्पना से सजी हुई रचना !!!!

Comment by vijay nikore on October 26, 2013 at 6:45pm

बहुत ही सुन्दर रचना है। बधाई।

Comment by बृजेश नीरज on October 25, 2013 at 10:36pm

आदरणीय केवल भाई आपका हार्दिक आभार!

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