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गजल: प्यार में कैसी ये त्रासदी हो गई/शकील जमशेदपुरी

बह्र: 212 212 212 212

__________________________

प्यार में कैसी ये त्रासदी हो गई

देख कर पीर पलकें दुखी हो गई

तेरी यादों ने दिल पे यूं दस्तक दिया
आंख बहने लगी औ नदी हो गई

संग तेरे तो बरसों भी पल भर लगा
एक पल की जुदाई सदी हो गई

प्रेम के मानकों पर जो परखा नहीं
भूल बस एक हम से यही हो गई

शेअर ऐसे नहीं हैं जो दिल पर लगे
आज फिर दर्दे दिल में कमी हो गई

कश्मकश में अभी तक पड़ा है ‘शकील’
कैसे इक शख्स की वो सगी हो गई?

-शकील जमशेदपुरी
________________________________

*मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by शकील समर on October 21, 2013 at 8:49am

बहुत बहुत आभार आदरणीय वीनस सर,
आपका सुझाव पाकर धन्य महसूस कर रहा हूं।

Comment by Abhinav Arun on October 21, 2013 at 6:40am

कश्मकश में अभी तक पड़ा है ‘शकील’
कैसे इक शख्स की वो सगी हो गई?...क्या कहने शकील जी वाह आनंदित हूँ , बधाई !!

Comment by वीनस केसरी on October 21, 2013 at 2:14am

हा हा हा आख़िरी शेर ने तो लुत्फ़ आ दिया

खैर आप गई गईं में उलझ गए हैं ... कई मिसरों में वाक्य विन्यास के कारण गईं होना चाहिए और ऐसा करते ही शेर खारिज हो जाएगा और ऐसा न् किया तो वाक्य विन्यास दोष पूर्ण हो रहा है

जैसे - पलकें दुखी हो गई कि जगह पलकें दुखी हो गईं होना चाहिए  ...

आंख बहने लगी औ नदी हो गई.... एक आँख तो बहती नहीं है .. इसे आँखें करना पड़ेगा और आँखें करते ही गई को गईं करना पड़ेगा

इससे बचिए ये बड़ा दोष है . इसी कारण आपकी ग़ज़ल के दो शेर खारिज हो जा रहे हैं

Comment by शकील समर on October 20, 2013 at 7:37pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय रामनाथ जी...

Comment by रामनाथ 'शोधार्थी' on October 20, 2013 at 7:34pm

बहुत उम्दा है शकील साहब...खासतौर पर यह शे'र मुझे बहुत पसंद आया............//.

शेअर ऐसे नहीं हैं जो दिल पर लगे
आज फिर दर्दे दिल में कमी हो गई................लाजवाब

कृपया ध्यान दे...

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