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संवेदन शील मन
बार-बार क्यों
डूबता उतराता है
संवेदना के समंदर में
हजारबार गोते खाता है
प्रश्नों का अम्बार है
आज तो मर्यादा का व्यापार है
वास्तव में संवेदनाहीन हो रहा संसार है
गरीवी ,लाचारी ,बेचारी ,बेरोजगारी और कुछ शब्द थे ,
जिनमें संवेदना का अधिकार व्याप्त था
संवेदनशील मन के लिए इन शब्दों का होना पर्याप्त था
किन्तु संवेदना की परिभाषा बदल गयी
जहाँ संवेदना थी ओ भाषा बदल गयी
आज अत्याचारी ,बलात्कारी, भ्रष्टाचारियों पर
तथा कथित आदमी कहलाये जाने बाले संवेदनशील है
क्यों कि आधुनिक पहाडा के गिनती में वही प्रगतिशील है
ये भार समाज को चलानेवाले ठेकेदार

बहुत मेहनत और इज्जत से उठा रहे है
कुतर्क को तर्क बना आधुनिकता का गीत गा रहे हैं
अभिमान के अधेरे में माँ भारती का मान  रो रहा है
बेटी नहीं सुरक्षित पिता का स्वाभिमान रो रहा है
संवेदना मेरे मन में नहीं
तुम्हारे मन में नहीं
हम सबके मन में नहीं
पर हिन्द का मन अति संवेदनशील है
इसलिए आज हिंदुस्तान रो रहा है .........

मौलिक /अप्रकासित
दिलीप तिवारी   

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 16, 2013 at 11:09am

रचना में आजकी विसंगतियों पर कविमन की अकुलाहट साफ़ दीखती है. आपकी संवेदना को मेरी शुभकामनाएँ.

शुभेच्छाएँ

Comment by दिलीप कुमार तिवारी on October 9, 2013 at 12:07am

आदरणीय शुसील जी आपने रचना को इतना स्नेह दिया है यह मेरा  सौभाग्य है ........धन्यवाद

Comment by दिलीप कुमार तिवारी on October 9, 2013 at 12:03am

आदरणीय   गिरिराज  जी आप का स्नेह और आशीर्वाद में हमारे रचना की सफलता है आभार .....धन्यवाद

Comment by दिलीप कुमार तिवारी on October 9, 2013 at 12:00am

आदरणीय अखिलेश जी आप सभी के आशीष और स्नेह में हमारी प्रगति है… आभार

Comment by दिलीप कुमार तिवारी on October 8, 2013 at 11:57pm

"एक एक पंक्ति महत्वपूर्ण है, हर संवेदना अब सिर्फ चूर्ण है!" आदरणीय जवाहर जी महत्व पूर्ण टिप्पणी के लिए धन्यवाद आभार .....

Comment by दिलीप कुमार तिवारी on October 8, 2013 at 11:55pm
Comment by अरुन 'अनन्त' on October 8, 2013 at 10:42pm

वर्तमान परिस्थिति को आपने बहुत ही सुन्दरता से उकेरा है, बेहद सुन्दर अभिव्यक्ति आदरणीय बहुत बहुत बधाई स्वीकारें

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on October 8, 2013 at 8:57pm

संवेदना मेरे मन में नहीं 
तुम्हारे मन में नहीं 
हम सबके मन में नहीं 
पर हिन्द का मन अति संवेदनशील है 
इसलिए आज हिंदुस्तान रो रहा है .........

एक एक पंक्ति महत्वपूर्ण है, हर संवेदना अब सिर्फ चूर्ण है!

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on October 8, 2013 at 10:25am

 बधाई दिलीप तिवारीजी । आदमी सिकुड़ गया है, इसलिए संवेदनाहीन हो गया है।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 8, 2013 at 7:29am

आदरणीय दिलिप भाई , आज की स्थिति का बहुत वास्तविक और अच्छा चित्रण किया आपने !!!!! बहुत बहुत बधाई !!!!!

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