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इन्द्रजाल ......(दोहावली)// डॉ० प्राची

आँख मिचौली खेलता, मुझसे मेरा मीत 

अंतरमन के तार पर, गाए मद्धम गीत 

जैसे सूरज में किरण, चन्दन बसे सुगंध 

प्रियतम से है प्रीत का, मधुरिम वह सम्बन्ध  

क्यों अदृश्य में खोजता, मनस सत्य के पाँव 

सहज दृश्य में व्याप्त जब, उसकी निश्छल छाँव 

संवेदन हर गुह्यतम, सहज चित्त को ज्ञप्त

आप्त प्रज्ञ सम्बुद्ध वो, ज्ञानांजन संतृप्त 

प्रीत प्रखरता जाँचती, नित्य नियति की चाल 

मोहन लोभन फाँसते, छद्म इन्द्र के जाल 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 29, 2013 at 8:50pm

दोहा प्रयास की सार्थकता को मान देने के लिए आभार आ० अनुराग सैनी जी 

Comment by डॉ. अनुराग सैनी on September 29, 2013 at 2:30pm

एक उत्कृष्ट दोहावली ! सार्थक प्रयास ! हार्दिक बधाई !


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 29, 2013 at 1:17pm

दोहावली पर उत्साहवर्धक अनुमोदन के लिए हार्दिक आभार प्रिय राम शिरोमणि पाठक जी 

Comment by ram shiromani pathak on September 29, 2013 at 10:56am

जैसे सूरज में किरण, चन्दन बसे सुगंध 

प्रियतम से है प्रीत का, मधुरिम वह अनुबंध //////बहुत प्यारी उपमा 

क्यों अदृश्य में खोजता, मनस सत्य के पाँव 

सहज दृश्य में व्याप्त जब, उसकी निश्छल छाँव ////सदैव यथार्थ 

बहुत ही उच्च कोटि के दोहे आदरणीया प्राची जी //हार्दिक बधाई आपको 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 29, 2013 at 10:45am

आ० बैद्यनाथ सारथी जी 

दोहों की प्रस्तुति और बिम्ब आपको प्रिय लगे, यह जानना संतोषकारी है ..हार्दिक धन्यवाद 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 29, 2013 at 10:35am

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी 

दोहावली के कथ्य की गूढता आपको पसंद आयी.. और आपका प्रोत्साहित करता अनुमोदन प्राप्त हुआ..आपको हार्दिक धन्यवाद 

Comment by Saarthi Baidyanath on September 29, 2013 at 10:28am

सच कहूँ तो .... अति प्रिय लगी  ! अत्यंत मधुर और सहज बिम्ब के साथ मनोहारी रचना ..बधाई आपको :)


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 29, 2013 at 6:47am

आदरणीया प्राची जी , बहुत सुन्दर , गूढ़ बातें लिये आपके दो हे अच्छे लगे !!  आपको हार्दिक बधाई !!

कृपया ध्यान दे...

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