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ग़ज़ल : दिल हो गया है जब से टूटा हुआ खिलौना

बह्र : २२१ २१२२ २२१ २१२२

 

दिल हो गया है जब से टूटा हुआ खिलौना

दुनिया लगे है तब से टूटा हुआ खिलौना

 

खेले न कोई इससे, फेंके न कोई इसको

यूँ ही पड़ा है कब से टूटा हुआ खिलौना

 

बेटा बड़ा हुआ तो यूँ चूमता हूँ उसको

अक्सर लगाऊँ लब से टूटा हुआ खिलौना

 

बच्चा गरीब का है रक्खेगा ये सँजोकर

देना जरा अदब से टूटा हुआ खिलौना

 

‘सज्जन’ कहे यकीनन होंगे अनाथ बच्चे

जो माँगते हैं रब से टूटा हुआ खिलौना

-------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 939

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 22, 2013 at 11:50pm

बहुत बहुत धन्यवाद Dr.Prachi Singh जी


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 25, 2013 at 10:31am

बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है आ० धर्मेन्द्र जी 

बच्चा गरीब का है रक्खेगा ये सँजोकर

देना जरा अदब से टूटा हुआ खिलौना

इस कहन  पर विशेष बधाई स्वीकार कीजिये 

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 23, 2013 at 7:38pm

बहुत बहुत धन्यवाद वीनस  जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 23, 2013 at 7:37pm

बहुत बहुत शुक्रिया vineet agarwal जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 23, 2013 at 7:37pm

बहुत बहुत धन्यवाद Dr Ashutosh Mishra जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 23, 2013 at 7:37pm

बहुत बहुत शुक्रिया Baidya Nath 'सारथी' जी

Comment by वीनस केसरी on September 21, 2013 at 10:45pm

वाह जी वा तुस्सी ग्रेट हो

Comment by vineet agarwal on September 20, 2013 at 10:46pm
Kya baat hai sahab ..badhayi
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 20, 2013 at 9:31pm

बहुत बहुत धन्यवाद अरुन शर्मा 'अनन्त' जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 20, 2013 at 9:31pm

बहुत बहुत धन्यवाद  MAHIMA  जी

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