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हमने घर की दीवारों में    

जीवन की इक आस सजायी

 

रत्ती-रत्ती सुबह बटोरी

टुकड़ा-टुकड़ा साँझ संजोई

इस चुभती तिमिर कौंध में

दीपों की बारात सजायी

 

तिनका-तिनका भाव बटोरे 

टूटे-फूटे सपन संजोये

साँसों की कठिन डगर पे

आशा ही दिन-रात सजायी  

 

भूख सहेजी, प्यास सहेजी 

सोती-जगती रात सहेजी 

यूँ चलते, गिरते-पड़ते 

कितनी टूटी बात सजायी

 

तेरे हाथों के स्पर्शों ने   

इन होठों की मुस्कानों ने  

मेरे इस सूने मन में

सहज सुनहरी प्रीत सजायी  

 

                  - बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by बृजेश नीरज on September 13, 2013 at 6:51pm

आदरणीय केवल जी, मेरी रचना को समय देने तथा मार्गदर्शन हेतु आपका हार्दिक आभार!

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on September 13, 2013 at 6:46pm

आ0 बृजेश भाई जी, भाई जी यह क्या है?

हमने घर की दीवारों में .......हमने या ..मैंने
जीवन की इक आस सजायी

रत्ती.रत्ती सुबह बटोरी
टुकड़ा.टुकड़ा साँझ संजोई.......प्रवाह बाध्य?
इस चुभती तिमिर कौंध में......गेयता बाध्य है!
दीपों की बरसात सजायी.......दीपों की अवलियां या कतारें या समूह होते हैं..आपने दीपों की बरसात ही कर दी। वाह.. वाह खूब कही।

तिनका.तिनका भाव बटोरे
टूटे.फूटे सपन संजोये......स्वप्न या सपने
साँसों की कठिन डगर पे
उम्मीदों की बारात सजायी..........मात्रा का भी निर्वहन नहीं हुआ।

भूख सहेजीए प्यास सहेजी
सोती.जगती रात सहेजी
यूँ चलतेए गिरते.पड़ते
कितनी टूटी बात सजायी

तेरे हाथों के स्पर्शों ने
इन होठों की मुस्कानों ने......मुस्कानों  ने या से
मेरे इस सूने मन में
सहज सुनहरी प्रीत सजायी
-------------------------------------------------------------------------सादर,

Comment by बृजेश नीरज on September 13, 2013 at 6:32pm

आदरणीया अन्नपूर्णा जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on September 13, 2013 at 6:31pm

आदरणीय शिज्जू जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on September 13, 2013 at 6:31pm

आदरणीय अरुन भाई आपका हार्दिक आभार!

Comment by annapurna bajpai on September 13, 2013 at 6:22pm

बहुत ही सुंदर रचना पढ़ने वाला मंत्र मुग्ध सा पढ़ता चला जाता है। बार बार पढ़ें फिर भी कम ही है आपकी लेखनी का जादू कुछ ऐसा ही है । बहुत बधाई आपको आ0 बृजेश जी ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 13, 2013 at 4:43pm

वाह आदरणीय बृजेशजी प्रवाहमयी प्रस्तुति है पढ़ो तो यूँ लगता है पढ़ता ही रहूँ, दिली दाद कुबूल करें

Comment by अरुन 'अनन्त' on September 13, 2013 at 3:54pm

वाह वाह आदरणीय बृजेश भाई जी मुग्ध कर दिया आपने बहुत ही सुन्दर मनोहारी रचना है भाई जी भावपूर्ण प्रस्तुति के लिए दिल से बधाई स्वीकारें.

Comment by बृजेश नीरज on September 13, 2013 at 3:34pm

आदरणीय जितेन्द्र जी आपका बहुत आभार!

Comment by बृजेश नीरज on September 13, 2013 at 3:33pm

आदरणीय रविकर जी मार्गदर्शन हेतु आपका हार्दिक आभार!

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