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साँझ ढली तो आसमान से धीरे-धीरे

रात उतर आई चुपके-चुपके डग भरती

स्याह रंग से भरती कण-कण वह यह धरती

शांत हुआ माहौल और सब हलचल धीरे

 

कल-कल करती धारा का स्वर नदिया तीरे

वरना तो, सब कुछ शांत, भयावह रूप धरे

जीव सभी चुप हैं सहमे, दुबके और डरे

कुछ अनजानी आवाज़ें खामोशी चीरे

 

मन सहमा जब भीतर यह काली पैठ हुई

लोभ और मोह कितने उसके संग उपजे

भ्रम के झंझावातों में पग पल-पल बहके

साथ सभी छूटे, आभा सारी भाग गई

 

सहसा कुछ किरनें फूटीं, इक आशा जागी

जग की, मन की परतों से सब कालिख भागी

                                        - बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 26, 2013 at 8:37pm

आ0 बृजेश भाई जी, /मन सहमा जब भीतर यह काली पैठ हुई
लोभ और मोह कितने उसके संग उपजे
भ्रम के झंझावातों में पग पल.पल बहके/ सुन्दर प्रभावपूर्ण रचना। हृदयतल से बधाई स्वीकारें। सादर,

Comment by ram shiromani pathak on August 26, 2013 at 8:29pm

कल-कल करती धारा का स्वर नदिया तीरे

वरना तो, सब कुछ शांत, भयावह रूप धरे

जीव सभी चुप हैं सहमे, दुबके और डरे

कुछ अनजानी आवाज़ें खामोशी चीरे///////////बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ भाई

आदरणीय भाई ब्रिजेश जी हार्दिक बधाई आपको ///सादर

Comment by बृजेश नीरज on August 26, 2013 at 8:16pm

आदरणीया अन्नपूर्णा जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by annapurna bajpai on August 26, 2013 at 7:55pm
सहसा कुछ किरनें फूटीं, इक आशा जागी
जग की, मन की परतों से सब कालिख भागी
आदरणीय बृजेश जी बहुत सुंदर पंक्तियाँ बहुत बधाई आपको ।
Comment by बृजेश नीरज on August 26, 2013 at 6:47pm

आदरणीय सुरेन्द्र जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on August 26, 2013 at 6:11pm

मन सहमा जब भीतर यह काली पैठ हुई

लोभ और मोह कितने उसके संग उपजे

भ्रम के झंझावातों में पग पल-पल बहके

साथ सभी छूटे, आभा सारी भाग गई

 

सहसा कुछ किरनें फूटीं, इक आशा जागी

जग की, मन की परतों से सब कालिख भागी

प्रिय नीरज जी ..बहुत सुन्दर भाव और व्याख्या ..जीवन न जाने किन किन मुहानों से गुजरता है क्या सोचता देखता है पल पल बदलाव ..सुन्दर पंक्तियाँ

आभार आप का
भ्रमर ५

Comment by बृजेश नीरज on August 26, 2013 at 5:50pm

आदरणीय श्याम नारायण जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on August 26, 2013 at 5:45pm

आदरणीय अरुन भाई आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on August 26, 2013 at 5:44pm

आदरणीय गिरिराज जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on August 26, 2013 at 5:44pm

आदरणीय शरदिंदु जी आपका हार्दिक आभार!

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