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बोलो नेहा ! इतनी उदास क्यों हो ?

पर सूनी आँखों में कोई ज़वाब न देख, अपने हक के लिए कभी एक शब्द भी न कह पाने वाली दिव्या,  अचानक हाथ में प्रोस्पेक्टस के ऊपर एडमीशन फॉर्म के कटे-फटे टुकड़े लिए, बिना किसी से इजाज़त मांगे और दरवाजा खटखटाए बगैर, सीधे ऑफिस में घुसी और डीन की आँखों में आँखे डाल गरजते हुए बोली “देखिये और बताइये– क्या है ये? आपकी शोधार्थी नें एडमीशन फॉर्म के इतने टुकड़े क्यों कर डाले? दो साल से सिनॉप्सिस तक प्रेसेंट नहीं हुई, क्यों ? इतना कम्युनिकेशन गैप? आखिर समय क्यों नहीं देते आप अपने शोधार्थियों के कार्य को? एक ज़िंदगी के खत्म हो जाने के ज़िम्मेदार बनेंगे क्या आप ?”

और डीन की जुबान से बस इतना ही निकला “आप हमारी छात्रा नहीं हैं, अब इस बारे में हम आपसे क्या बात करें...”

रासलीलाओं पर तत्कालीन विराम के साथ ही महाशय होश में आ चुके थे और अगली सुबह नेहा के लिए एक नया सवेरा थी.

मौलिक और अप्रकाशित 

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 1, 2013 at 9:11pm

आदरणीया वसुंधरा पाण्डेय जी 

लघुकथा का कथ्य आपको मर्मस्पर्शी लगा व आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया मिली

आपका सादर धन्यवाद 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 1, 2013 at 9:06pm

हार्दिक धन्यवाद आ० मंजरी पाण्डेय जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 1, 2013 at 9:05pm

लघुकथा का सन्देश पसंद करने के लिए हार्दिक आभार आदरणीया अन्नपूर्णा जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 1, 2013 at 9:05pm

आदरणीय विजय निकोर जी 

लघु कथा पर आपकी सराहना के लिए सादर धन्यवाद 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 1, 2013 at 9:03pm

प्रिय अनुज अरुण शर्मा जी 

लघुकथा की सराहना और बधाई सम्प्रेषण के लिए हार्दिक धन्यवाद 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 1, 2013 at 9:02pm

लघुकथा की सराहना कर उत्साहवर्धन करने केलिए सादर धन्यवाद आ० बृजेश जी 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 1, 2013 at 9:01pm

हार्दिक आभार आदरणीय राजेश कुमारी जी 

बिल्कुल सही कहा आपने जुर्म के खिलाफ आवाज़ उठानी ही पढ़ती है 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on September 1, 2013 at 9:00pm

लघुकथा पर आपके अनुमोदन के लिए धन्यवाद आ० श्याम जुनेजा जी 

Comment by Vasundhara pandey on August 27, 2013 at 6:50am

आदरणीय प्राची जी...गजब...दिल को छू गयी लघु कथा ..

इस कहानी को तो मुझे अपने भाई को पढ़ाना पडेगा ...!

Comment by mrs manjari pandey on August 25, 2013 at 2:49pm

        आपने सच का आइना दिखाया है.  बधाई डाक्टर प्राची जी.

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