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चाँद की बात न कर

न मौसम बदलता है,

न एहसान चढाता है

न जलता-जलाता,

बस खुद को लुटाता है

 

समझता है .मेरी व्यथा

जी जान से

मेरी थकान मिटाता है 

दुबला जाता कैसे

मेरे गम में

 

और पाकर मुझे

कुप्पे सा फूल जाता है

 

चाँद की बात न कर

वह तो हर रात नया रूप

यौवन भरपूर..

मुझे रिझाने में जुटा

 

उसका यह सिलसिला तो

सदियों से है...

 

उसके जैसी चाह

उसके जैसी शोखी

और भला किस में है ?

 

प्रेमियों का प्रेम है

मेरे इस चाँद की बात न कर... !! 

(मौलिक व अप्रकाशित )

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on August 6, 2013 at 10:22pm

प्रेमियों का प्रेम है, मेरे इस चाँद की बात न कर...!!

अहा !! सुंदर भावों की सुंदर शब्दों में प्रस्तुति मन को मुग्ध कर गई...

आदरणीया, बधाई...........

Comment by Vinita Shukla on August 6, 2013 at 9:20pm

सुंदर शब्द विन्यास, प्रभावी तथा भावपूर्ण अभिव्यक्ति. बधाई वसुंधरा.

Comment by Vasundhara pandey on August 6, 2013 at 8:53pm

सादर आभार राणा जी.... !!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 6, 2013 at 8:24pm

सुन्दर रचना के लिए बधाई स्वीकारें|

Comment by Vasundhara pandey on August 6, 2013 at 7:05pm

थैंक्स दी !

Comment by Meena Pathak on August 6, 2013 at 5:37pm

प्रेमियों का प्रेम है

मेरे इस चाँद की बात न कर... !!   बहुत सुन्दर रचना, बधाई वसू  :) 

Comment by Vasundhara pandey on August 6, 2013 at 5:33pm

स्नेहाभिक्त टिप्पड़ी के लिए सादर आभार जितेन्द्र जी!

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 6, 2013 at 5:27pm

प्रेमियों का प्रेम है

मेरे इस चाँद की बात न कर... !! 

सच ! सजीव व् खुबसूरत पंक्तियाँ 

हार्दिक शुभकामनायें ,आदरणीया  वसुंधरा जी 

 

 

Comment by Vasundhara pandey on August 6, 2013 at 5:03pm

अमन जी धन्यवाद आपको ,बहुत-बहुत !

Comment by Vasundhara pandey on August 6, 2013 at 5:03pm

आदरणीय श्याम नारायण  जी बहुत बहुत आभार आपका..!!

कृपया ध्यान दे...

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