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शब्द ही तो थे …
नयनों के झिलमिल
बिम्बों की भाषा
तरल सीकरों में
ढलती अभिलाषा

टूट तो जाने ही थे
अन्तस् के बंध;
विष  से उफनाये वे-
कटुता के छंद !
शब्द ही तो थे...

फट पडीं, ज्यों बेतरह
कपास की गाठें
चिंदी चिंदी  बिखर गये -
अनछुए अर्थ
विद्रोही पवन का
पाकर स्पर्श 
खुले अवगुंठन

 वह उद्दात्त मन का प्रस्फुटन!

शब्द ही तो थे…
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Views: 1236

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Comment by Vinita Shukla on August 5, 2013 at 8:49pm

गीतिका 'वेदिका जी, सराहना हेतु अनेकानेक धन्यवाद.

Comment by Aditya Kumar on August 5, 2013 at 8:02pm

बहुत ही सुन्दर रचना है "हार्दिक सुभकामनाये आपको"

Comment by Vasundhara pandey on August 5, 2013 at 7:47pm

you know विनीता जी ..आपकी लेखनी की कायल हूँ मैं पहले से ही,,,.बहुत ही सुन्दर लिखती हैं आप...

Comment by वेदिका on August 5, 2013 at 6:31pm

शब्दों को परिभाषित करती सशक्त रचना

बहुत बधाई, आदरणीया विनीता जी

Comment by Vinita Shukla on August 5, 2013 at 6:09pm

हार्दिक आभार, आदरणीय लक्ष्मण प्रसाद जी.

Comment by Vinita Shukla on August 5, 2013 at 6:09pm

बहुत बहुत धन्यवाद आ. मीना जी.

Comment by Vinita Shukla on August 5, 2013 at 6:08pm

हार्दिक धन्यवाद, अन्नपूर्णा जी.

Comment by Vinita Shukla on August 5, 2013 at 6:07pm

अरुण 'अनन्त' जी, आपका कोटिशः धन्यवाद.

Comment by Vinita Shukla on August 5, 2013 at 6:07pm

बृजेश नीरज जी, आपका अतिशय आभार.

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on August 5, 2013 at 3:41pm

शब्द ही तो है जिनसे पगी आपकी यह सुन्दर रचना, हार्दिक बधाई विनीता जी| सादर 

 शब्दों का ही जाल है,  जिनसे  हो सम्बन्ध,

 शब्द बिना क्या लिख सके,कोई ललित निबंध  

कृपया ध्यान दे...

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