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आजादी का मतलब //कुशवाहा //......कहानी

आजादी का मतलब

 

रामगढ़ के जमींदार ठाकुर दानवीर सिंह जैसा उनका नाम था उसी के अनुसार उनका चरित्र एवं व्यवहार था। गरीब कन्याओं के विवाह में मदद करना, किसान की फसल नष्ट होने पर उसके परिवार के भरण पोषण की जिम्मेदारी उठाना या कोई भी धार्मिक या सामाजिक कार्यक्रम हो तो उसमें अपना पूरा सहयोग देना उनकी प्राथमिकता थी। अतिथियों का स्वागत करने में तो उनका कोई सानी नही था। अस्पताल, धर्मशाला, विद्यालय उनके द्वारा बनवाये गये साथ ही पशुओं के लिये चारागाह इत्यादि की व्यवस्था भी थी। गरीब विद्यार्थियों के लिये प्राथमिक एवं उच्च शिक्षा के लिये वे भरपूर मदद करते थे। प्रत्येक धर्म एवं प्रत्येक जाति के प्रति वे सम भाव रखते थे। जितना स्नेह वे अपने क्षेत्र के नागरिकों से रखते थे उससे ज्यादा उनका सम्मान वहाँ  के नागरिक करते थे, धरती के भगवान के रुप में पूजे जाते थे।

ठाकुर दानवीर सिंह के चार पुत्र थे। वे भी इन्हीं गुणों से परिपूर्ण थे। ज्यों ज्यों पुत्र शिक्षा प्राप्त करते गये धीरे धीरे समय आने पर चारों पुत्रों का विवाह कर दिया। उनके तीन पुत्रों के प्रत्येक के यहा पुत्रियों ने जन्म लिया परन्तु सबसे छोटे ठाकुर इन्द्रजीत सिंह इस सुख से वंचित रहे। आशा निराशा  के बीच जीवन व्यतीत करते रहे। ईश्वर  कृपा हुई तो विवाह के बारह वर्ष बीतने के बाद  एक पुत्र ने जन्म लिया। परिवार में हर्ष की लहर दौड़ गई। इसका नाम राघव रखा गया।

पूरे परिवार में एक मात्र यही पुत्र था . ठाकुर साहब एवं परिवार के लोग शिक्षा का महत्व जानते थे तो आपसी राय के अनुसार ठाकुर इन्द्रजीत सिंह के लिये पास के शहर वैभव नगर में एक आलीशान भवन की व्यवस्था करते हुए भेज दिया गया।

पूरे परिवार में इकलौता लड़का होने के नाते पूरा परिवार का प्यार और दुलार उसे प्राप्त था। ऐसा नही था कि लड़का होने के नाते उसकी चचेरी बहनों से ज्यादा प्यार, दुलार व सम्मान उसे मिलता हो बल्कि उसकी बहनो को भी वही प्यार, दुलार व सम्मान उसके माता पिता देते थे जितना कि राघव को। ठाकुर परिवार ने मात्र शिक्षा ही नही पायी थी बल्कि वे वास्तविक रुप से शिक्षित थे।  

बडे़ लाड़ प्यार से राघव का पालन किया जा रहा था। धीरे-धीरे समय बीतता गया और राघव भी बड़ा होता गया। इसके माता पिता कभी-कभी राघव को देखते और बैचेन हो जाते थे कि जैसी चंचलता बच्चों में होती है वैसी चंचलता राघव में  नही थी। वे इसका कारण भी ढूँढने  का प्रयास करते। फिर सोचते कि चलो आगे चलकर  जब यह और  बड़ा हो जायेगा तो शायद इसमें परिवर्तन आ जाये। फिर वे कर भी क्या सकते थे।

राघव चंचल तो नही था परन्तु तीव्र बुद्धि का स्वामी था। बचपन से उसमें एक शौक था अपने बगिया में लगे पौधों को पानी देने, पढ़ाई के बाद वह बाहर के  बच्चों के साथ न खेलकर अपनी बगिया में चला जाता। एक-एक पौधे के पास जा कर उसमें खिले फूलों को निहारता रहता। जिन पौधों में फूल नही खिलते उनके विन्यास को घण्टों एक टक निहारता रहता। पेड़ के नीचे काफी देर तक बैठना, आसमान की ओर टकटकी लगाये निहारना। पेड़ से उतरती, चढ़ती गिलहरी को देखना, उसके पीछे भागना, तितलियों को पकड़ना फिर उसे शीशी में डालना। बगिया में विभिन्न प्रकार की चिडि़यां भी आ कर बैठती थीं। वो उनको खाने के लिये दाने डालता। पानी पीने के लिये बर्तन भी  रखवा दिया था। चिडि़यां  उसमें पानी पीतीं, चोंच से अपने मुँह  को पानी में भिगोती, उसमें नहाती फिर जब वे अपने मुँह  या शरीर को झटकतीं और पानी की बूँदें  छितरतीं तो राघव को बहुत अच्छा लगता था। वैसे तो वह यदा कदा ही मुस्कराया हो परन्तु अपनी बगिया में जाते ही उसके मन की बगिया खिल जाती थी। इसको देख कर उसके माँ-बाप को भी काफी सन्तोष मिलता था। ऐसा ही वह अपने विद्यालय में भी करता था। अपने सहपाठियों के साथ भी वह ज्यादा घुला मिला नही था। उसका होम वर्क हमेशा  पूरा रहता था तथा कक्षा में भी एक अनुशासित छात्र की तरह था। प्रश्न  पूंछे  जाने  पर सदैव सही उत्तर देता था। उसके शिक्षक भी उससे प्रसन्न रहते थे तथा कक्षा के अन्य विद्यार्थियों को भी राघव की तरह बनने की प्रेरणा  देते थे।

एक दिन राघव अपने मित्र के  यहाँ  उसकी जन्मदिन की पार्टी में गया। वहाँ  उसने देखा की उसके यहाँ  पिंजड़ों में तोते, कबूतर, मैना, बटेर, कई प्रकार की रंग बिरंगी चिडियाँ  बाडे़ में कूदते खरगोश थे। उसका मन पार्टी में न लग कर बार इन्ही पक्षियों, एक्वेरियम की ओर दौड़ जाता था। काफी अनमने मन से राघव जब अपने घर लौटा तो राघव की  माता आनन्दी ने उसको प्यार से अपनी गोद में ले कर पूंछा। राघव बोला मा  नमन के घर पर बड़े सुन्दर सुन्दर पक्षी हैं, चिडि़यां है, खरगोश  हैं, मछलियां हैं। मेरा मन उसी में  लगा है। अपने लाड़ले पुत्र की इच्छा को जानकर आनन्दी ने शाम को अपने पति से राघव की इच्छा को व्यक्त किया। राघव की इच्छा के अनुरुप अगले दिन बाजार से सारी व्यवस्था कर दी। राघव का हृदय प्रसन्नता से भर गया।

समय बीतता गया। राघव दसवीं कक्षा में पहुँच गया। ठाकुर परिवार में ईश्वर  कृपा से सब अच्छा चल रहा था। जैसा कि शहर की भव्य कालोनी के निवासी अपने पड़ोसियों को भी नही पहचानते। कारण चाहें जो हो या तो दूर से आकर बसे हों, व्यस्त जीवन, समय का अभाव या अपने पद वैभव का घमण्ड हो परन्तु ठाकुर इन्द्रजीत सिंह एवं इनके परिवार के सदस्यों का वैभवनगर में रहने वालों से अच्छी जान पहचान एवं घरेलू सम्बन्ध थे। इसका मुख्य कारण था कि इस परिवार ने अपने पिता ठाकुर दानवीर सिंह द्वारा दिये गये संस्कारों को मूर्त रुप दिया था।

दीवाली की शाम को राघव भवन में कोहराम मचा था। और क्यों न मचे, राघव घर से कोचिंग पढ़ने गया था और चार घण्टे से उपर का समय बीत गया था राघव कोचिंग से घर नही लौटा और न ही कोई सूचना ही मिली कि वह कहाँ  है। आस पास पता किया गया, कोचिंग में पता किया गया पता चला कि कोचिंग आया था और कोचिंग से समय पर ही घर जाने को निकला था। उसके मित्रों के यहाँ  भी पता किया गया। राघव का कहीं पता नही चला। रामगढ़ में भी खबर की गई, वहाँ  भी उसका पता नही चला। राघव भवन रामगढ़ एवं वैभव नगर के निवासियों  से भर गया। हर एक दुःखी एवं चिंतित। आनन्दी, माँ का हृदय, उसकी पीड़ा, अकथनीय, केवल एक माँ  ही माँ  की पीड़ा को समझ सकती है, दूसरा कोई नही। हाल बेहाल, बस नजर दरवाजे पर, हर आने जाने वाले से एक ही प्रश्न  पता चला, कहाँ  है राघव । एक फोन, बीस लाख की फिरौती, पुलिस को न बताने, चालाकी न बरतने की धमकी, उसका परिणाम। राघव का अपहरण हो गया। दीवाली की अमावस ठाकुर परिवार की अमावस हो गयी। कौन ले गया राघव को, किसी से दुष्मनी नही, किसी को सताया नही, सभी के लिये शुभेच्छा, सभी से स्नेह, फिर कौन और क्यों क्या पैसा। वैभव नगर जो दीवाली में दुल्हन सा सजता था आज घनघोर अन्धेरे की चादर ओढे़ था। असमंजस की स्थिति क्या करें और क्या न करें। पुलिस की सहायता लेते हैं तो कहीं राघव को खोना न पडे़। अज्ञात भय। भविष्य अंधकारमय। आशा  निराशा  के हिंडोले पर विचारों का प्रवाह। पर यह बात कब तक छुपती। कोई सामान्य आदमी तो थे नही, ठाकुर साहब। स्थानीय पुलिस सतर्क। पूँछताछ जारी। अनुमान अनुमान अनुमान। कोई परिणाम नही। रात बीती, दिन बीता, दो दिन बीते। अपहरणकर्ताओं का फोन। वही चेतावनी। राघव की बात ठाकुर इन्द्रजीत सिंह से। आशा  का दीप जलता, बुझता। राघव भवन में रहने वाले सारे सदस्य भी मौजूद। किस पर शक किया जाय, किस पर न किया जाय। सभी वर्षो से इस परिवार से जुडे़ थे। नौकरों के भी घर परिवार और उनके आचरण से भली भाँति भिज्ञ थे। फिर कौन अनुत्तरित प्रश्न । अचानक ध्यान आता है कि एक सप्ताह पहले नौकर धनुआ का भतीजा गांव  से आया था परन्तु वही एक शख्स ऐसा था जो दीवाली की शाम से गायब था परन्तु उसकी ओर किसी का ध्यान नही गया। खोज की दिशा  बदली। पुलिस सर्विलांस तेज, प्रत्येक पर निगाह रखे हुए, गोपनीय तरीके से तैयारी और सफलता।

अपराधी धनुआ का भतीजा और उसके चार साथी पुलिस गिरफ्त में। हर्ष की लहर घर परिवार और नगर में। राघव अपने माँ के आँचल में ।

जैसे ही राघव घर वापस लौटा। थका हारा, बुरे हाल पर वह सीधा अपनी माँ  के पास पहुंचा , लिपट गया और किसी से बात न कर अपनी माँ  की उंगली को पकड़ कर अपनी बगिया में ले गया जहाँ सारे पक्षी और पशु  पिंजडे़ में बन्द थे। बगिया  में  पहुच कर उसने पिंजरे खोल दिये चिडि़यों, पक्षियों को उड़ा दिया। पालतू खरगोश  व दूसरे कई जानवरों को उनके स्थान  पर पहुंचाने  के लिये अपनी माँ से कहा। आनन्दी ने जब इसका कारण जानना चाहा और कहा ये तो तुमको बहुत प्यारे थे। अब इन्होंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था जो तुम सीधे बगिया में आकर इनको उड़ा दिया। कुछ दिन बाद तुम फिर इन्हें लाने को कहोगे।

राघव ने अपने अपहरण की कथा बताते हुए कहा कि माँ इन दिनों मैं किस दशा  में रहा तुम जानोगी तो बहुत कष्ट होगा। कहाँ  कहाँ  नही भटकाया, रस्सी में जकड़ा रहा। मुँह  कपडे़ से ढंका रहा। भूख प्यास, यातनाऐं सहनी पड़ी। कभी इस शहर, कभी उस गली, जीवन शेष रहेगा या नही। मानसिक यंत्रणा। क्या-क्या नही हुआ माँ । इनका स्थान यहाँ  नही है। 

मैं नादान था। आप समझाती मुझे तो शायद मैं ऐसा न करता। मैंने इनको आजाद कर दिया है। माँ मैं जान गया हॅू आजादी का मतलब।              

प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा 

१४-५-२०१३ 

मोलिक /अप्रकाशित 

 

 

 

 

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Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 29, 2013 at 4:46pm

आदरणीय अनुज श्री अशोक जी 

सादर /सस्नेह 

यूँ ही प्रोत्साहित करते रहिये 

आभार 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 29, 2013 at 4:45pm

स्नेही संदीप जी 

सादर आभार प्रोत्साहन हेतु 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 29, 2013 at 4:44pm

स्नेही राम शिरोमणि जी 

सादर आभार 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 29, 2013 at 4:44pm

आदरणीय सौरभ सर जी 

सादर 

आपका असीम स्नेह सदेव मुझे आगे बढ़ने को प्रेरित करता है 

आपका आभार भी तो व्यक्त नही कर सकता 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 29, 2013 at 4:42pm

स्नेही केवल प्रसाद जी 

सादर 

ये आपकी वजह से ही मंच पर आ सकी 

आभार 

Comment by Ashok Kumar Raktale on May 20, 2013 at 8:24am

आदरणीय प्रदीप जी सादर, सुन्दर संदेश देती और बालमन में सच्चे ज्ञान के अंकुरण को दर्शाती सुन्दर कहानी. सादर बधाई स्वीकारें.

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on May 16, 2013 at 3:10pm

बेहतरीन अर्थ पूर्ण ज्ञांवर्धक कथा पढ़ने को मिली
सादर बधाई हो सर जी आपको इस रचना हेतु

Comment by ram shiromani pathak on May 16, 2013 at 1:50pm

आ0 कुशवाहा जी,बालकथा के लिए आपको हृदय से धन्यवाद////////


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 15, 2013 at 10:29pm

इस सुन्दर और प्रासंगिक बालकथा के लिए आपको हृदय से धन्यवाद, आदरणीय प्रदीपजी.

आपकी किस्सागोई का बेहतर मुज़ाहिरा हुआ है.

सादर

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on May 15, 2013 at 8:31am

आ0 कुशवाहा जी,  सुप्रभात!  वाह! बहुत ही सुन्दर रचना। हार्दिक बधाई स्वीकारें।  सादर,

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