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मंच के सामने आठ दस लोग कुर्सियों पर बैठे थे। सफेद झक कुर्ता पायजामा पहने छरहरे बदन का एक युवक मंच पर खड़ा भाषण दे रहा था, ‘आज हमारे देश को भगत सिंह के आदर्शों की जरूरत है……..।‘ भाषण खत्म होने पर संचालक ने घोषणा की, ‘थोड़ी ही देर में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रारम्भ होंगे।‘

कुछ देर बाद एक युवती रंग बिरंगी वेशभूषा में मंच पर आयी और उसने एक गीत पर नृत्य आरंभ कर दिया ‘……चिकनी चमेली……’

भीड़ धीरे धीरे बढ़ने लगी थी।

सीटियां बज रही थीं।

भगत सिंह शहीद हो चुके थे। चमेली महक रही थी।

.

                                - बृजेश नीरज

 

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Comment by बृजेश नीरज on August 19, 2013 at 5:56pm

आदरणीया गीतिका जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by वेदिका on August 19, 2013 at 4:08pm

दिग भ्रमित लोग ही देश का संचालन कर रहे है, न जाने ये रथ कहाँ जा गिरे।
बधाई आपको आदरणीय बृजेश जी! आपने इस संवेदन को भाषित किया।   

Comment by बृजेश नीरज on April 15, 2013 at 6:50pm

आदरणीय योगराज जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद!


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on April 15, 2013 at 5:55pm

लाजवाब लघुकथा - मेरी हार्दिक बधाई स्वीकारें बंधुवर.

Comment by बृजेश नीरज on April 8, 2013 at 9:53pm

आदरणीया मीना जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by Meena Pathak on April 8, 2013 at 7:45pm

यही हो रहा है आज काल .. इस सार्थक लघुकथा के लिए बधाई बृजेश जी 

Comment by बृजेश नीरज on April 4, 2013 at 6:17pm

आदरणीय प्रदीप जी आपका आभार!

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 4, 2013 at 4:12pm

बदलते परिवेश में बदल गया देश 

ऐसा हो भी रहा है .

बधाई 

आदरणीय सिंह साहब जी 

सादर 

Comment by बृजेश नीरज on March 31, 2013 at 9:45pm

आदरणीय निकोर साहब आपने सत्य कहा लेकिन समस्या और विकट तब हो जाती है जब लोग प्रेय को ही श्रेय समझने लगते हैं। 

Comment by बृजेश नीरज on March 31, 2013 at 9:41pm

आदरणीय प्राची बहन आपका बहुत आभार! रचना आपको पसन्द आई मेरा लिखना सार्थक हुआ।

कृपया ध्यान दे...

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