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मैं श्रमित
जिन्दगी की जद्दोजहद से व्यथित
चली जा रही थी
अज्ञात गन्तव्य की ओर
प्रेममय संवाद सुनकर रुकी
सघन छांव ने दिया ठौर
मतवाली लतिका
तरु के उर पर करती बिहार
गद गद था तरु
जो लतिका बनी गले का हार
तूफां हो या भानु-ताप
थामे थे इक-दूजे का हाथ
मैं 'भाग्यवान ज्यादा',था विवाद का मसला
सुनकर हृदय मेरा मचला और बोला-
मैं धन्य तुम दोनों से कहीं अधिक हूं
शीतल छांव का भाजक एक पथिक हूं
त्याग समर्पण प्रीति के प्राण हैं
चैन बंटता है जिसकी सुखद छांव में
प्रेम ही तो जगत का सृजनहार है।
-विन्दु

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Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 26, 2013 at 2:38pm

प्रेम ही तो जगत का सृजनहार है।

सत्य है. 

सादर बधाई 

आदरणीया वन्दना जी 

Comment by Vindu Babu on March 21, 2013 at 2:54pm

सादर आभार आपका आदरणीय सौरभ पाण्डेय महोदय।
आपके आशीर्वचनो से अभिभूत हूं।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 15, 2013 at 10:43pm

प्रस्तुति हेतु हार्दिक धन्यवाद और शुभकामनाएँ.

प्रयुक्त शब्दों को रचना के अंतर्निहित भाव के साथ पगाते और साधते जायें.. .

शुभ-शुभ

Comment by Vindu Babu on March 13, 2013 at 8:32pm
हार्दिक आभार स्वीकारें आदरणीय बृजेश महोदय
कृपया सुधार भी सुझाएं आपका सादर स्वागत है।
Comment by बृजेश नीरज on March 13, 2013 at 7:12pm

//प्रेम ही तो जगत का सृजनहार है।//

बहुत सुन्दर संदेश!

बहुत सुन्दर रचना

अप्रतिम शब्द संरचना! 

Comment by Vindu Babu on March 13, 2013 at 4:20pm
आदरेय राम शिरोमणि जी आपका भी हार्दिक आभार!
सादर
Comment by Vindu Babu on March 13, 2013 at 4:18pm
आदरणीय विजय सर सादर अभिनन्दन!
आपकी टिप्पणी मेरे लिए अत्यन्त उत्साहवर्धक होती है,महोदय आपके स्नेह के लिए सादर आभार!
Comment by ram shiromani pathak on March 12, 2013 at 5:55pm

आदरणीया वंदना जी:

 

बहुत ही सुन्दर भाव हैं।

बधाई।

 

Comment by vijay nikore on March 12, 2013 at 4:32am

आदरणीया वंदना जी:

 

मैं धन्य तुम दोनों से कहीं अधिक हूं
शीतल छांव का भाजक एक पथिक हूं
त्याग समर्पण प्रीति के प्राण हैं
चैन बंटता है जिसकी सुखद छांव में
प्रेम ही तो जगत का सृजनहार है।

 

बहुत ही सुन्दर भाव हैं।

बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर

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