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बस कहूँगा राम-राम!

इस मलिन बस्ती से,
दूर जाना चाहता हूँ !
सब स्वार्थ से घिरे है ,
थोड़ा आराम चाहता हूँ !


ऐसा नहीं कि मै कमज़ोर हूँ ,
इनसे नहीं लड़ सकता !
अपनत्व दिखाते है फिर भी ,
चलते हैं चाल कुटिलता !


सोचा नहीं था मैंने कभी ,
हो जाऊंगा इतना हताश !
जब अपनों ने किया छल ,
तो करूँ किसपे विश्वास !


मोह माया से घिरा मै ,
लगाये बैठा था आस!
घर,परिवार,धन है फिर भी ,
एकांत बैठा हूँ ,होकर निराश!


उम्र का आखिरी पड़ाव है ,
नहीं शेष कोई काम !
शरण में ले लो हे ईश्वर ,
बस कहूँगा राम-राम!

राम शिरोमणि पाठक "दीपक"
मौलिक /अप्रकाशित

Views: 416

Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on March 6, 2013 at 11:30pm

इतनी घोर निराशा.भावाभिव्यक्ति तो ठीक है किन्तु ऐसी मनोदशा ठीक नहीं. भावों की अभिव्यक्ति पर बधाई स्वीकारें.

 

Comment by upasna siag on February 14, 2013 at 6:36pm

उम्र का आखिरी पड़ाव है ,
नहीं शेष कोई काम !
शरण में ले लो हे ईश्वर ,
बस कहूँगा राम-राम!.......??


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 13, 2013 at 9:21pm

//उम्र का आखिरी पड़ाव है ,
नहीं शेष कोई काम !
शरण में ले लो हे ईश्वर ,
बस कहूँगा राम-राम!//

प्रथम पहर में संझा की बात क्या बात है ...राम राम भाई जी ।

Comment by बसंत नेमा on February 13, 2013 at 4:51pm

badhai ho aap ko ek acchi kavita ke liye

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on February 13, 2013 at 12:06pm

अच्छे भाव मुखरित हुए हैं बंधू बधाई हो आपको 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 13, 2013 at 12:01am

युवा कवि के आयु विशेष की प्रच्छन्न मनोदशा के अनुरूप रचना.. .

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