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आदरणीय प्राची जी के कहने और भ्राताश्री अम्बरीश जी के द्वारा दिए गए दोहों के नियमों को पालन करते हुए, दोहे लिखने का मेरा प्रथम प्रयास है आप सभी को सादर समर्पित आप सभी के सहयोग की आकांक्षा लिए अरुन शर्मा.

 

आनन फानन में किया, दोहों का निर्माण।

मुझसे मेरी प्रियतमा, मांगे प्रेम प्रमाण।।

 

हाँथ जोड़ द्वारे खड़ा, माते जाओ जाग।

शिष्य मुझे स्वीकार के, खोलो मेरे भाग।।

 

पत्थर जोड़े घर बने, पत्थर गढ़े भगवान।

अपनी-अपनी सोंच में, आगे हर इंसान।।

 

दोहों का भोजन करूँ, दोहों से जलपान।

दोहे मेरी जिंदगी, दोहे मेरी जान।।

 

माँ तेरे विरह में, चुपचुप रहते तात।

आभाषित होता मुझे, दिन भी जैसे रात।।

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Comment

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Comment by अरुन 'अनन्त' on December 14, 2012 at 11:34am

आभार आदरणीया राजेश कुमारी जी स्नेह व आशीष यूँ ही बनाए रखियेगा


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on December 13, 2012 at 8:16pm

प्रिय अरुण दोहों पर आपका प्रयास सराहनीय है बाकी प्रिय प्राची और सीमा जी की बात का अनुमोदन करती हूँ आप बहुत जल्दी दोहों में निपुण हो जाओगे |

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 13, 2012 at 3:15pm

आदरणीया सीमा दी काफी त्रुटियाँ हैं फिर भी आप सभी ने जो मेरा हौंसला बढ़ाया है मैं सदैव कृतज रहूँगा अनेक-2 धन्यवाद.

Comment by seema agrawal on December 13, 2012 at 2:41pm

आनन फानन में किया, दोहों का निर्माण।

मुझसे मेरी प्रियतमा, मांगे प्रेम प्रमाण।।........हा हा हा अरुण सच में ये निर्माण आनन् -फानन ही लग रहा है आपकी ग़ज़लों में जिस प्रकार की विचारशीलता मिलाती है वो इनमे नहीं है ...पर एक बात की बधाई दूँगी कि शिल्प की दृष्टि से दोहे १००% न सही पर ९०% तो खरे हैं और यह आश्वस्ति है इस बात की कि आपका यह प्रथम प्रयास सही दिशा में है 

दोहों की विशेषता उसका कथ्य ही है  किसी कथ्य  पर बहुत विचार करने  के पश्चात उसे दोहों में अनुवादित करिए कथ्य स्वयं में सम्पूर्ण होना चाहिए 

दोहे ऐसे बांधिए जैसे सुरभित फूल l

ईश चरण वंदन करे, भाव लिए अनुकूल

 

 

शुभकामनाएं ........

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 13, 2012 at 1:48pm

आदरणीय सर सत्य कहा है आपने इन सभी को सुधारने कर पुनः प्रयास करता हूँ आभार.

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 13, 2012 at 1:47pm

आदरणीया प्राची जी तहे दिल से आभार आपका सत्य है काफी त्रुटियाँ है खास कर मात्रा गणना में, अगली बार और अधिक मेहनत करूँगा. सादर

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on December 13, 2012 at 10:21am
प्रथम प्रयास में सुन्दर सटीक दोहे रचने पर बड़ी खुश मिली, कुछ त्रुटिया मात्रा गिनने की और डॉ प्राची जी 
ने इंगित कर दिया है, सुधार करले \ प्रथम प्रयास पर हार्दिक बधाई और शुभ कामनाए -
 

आनन् फानन में किया, दोहों का निर्माण,

गुरूवर ही अब दे तुम्हे, सफलता का प्रमाण ।
 
पढ़कर मन प्रसन्न हुआ, अनंत ख़ुशी मनाय,
दोहे तेरी जिन्दगी,   दोहे भाग्य जगाय  ।  

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on December 13, 2012 at 10:11am

प्रिय अनुज अरुण,

दोहों कर किया गया प्रथम प्रयास मुग्धकारी है,

दोहों का भोजन करूँ, दोहों से जलपान।

दोहे मेरी जिंदगी, दोहे मेरी जान।।...............विधा विशेष के प्रति इतना  प्रेम प्रथम प्रयास में मुग्ध कर रहा है.

 

आनन फानन में किया, दोहों का निर्माण।

मुझसे मेरी प्रियतमा, मांगे प्रेम प्रमाण।।......दोहा निर्दोष है , पर क्या दोनों पदों के कथ्य में कोई सामंजस्य है??

 

हाँथ जोड़ द्वारे खड़ा, माते जाओ जाग।

शिष्य मुझे स्वीकार के, खोलो मेरे भाग।।....... माता को जगा कर शिष्य बनाने का निवेदन, जबकि माँ तो होती ही प्रथम गुरु है 

 

पत्थर जोड़े घर बने, पत्थर गढ़े भगवान।...सम चरण की मात्रा गणना पुनः करे.

अपनी-अपनी सोंच में, आगे हर इंसान।।.....सोंच   है या सोच ?

 

माँ तेरे विरह में, चुपचुप रहते तात।...........विषम चरण की मात्रा  गणना पुनः करे.

आभाषित होता मुझे, दिन भी जैसे रात।।........आभासित लिखना चाहते हैं, टंकण त्रुटि सुधार लें.

इस प्रयास के लिए बहुत बहुत बधाई, जल्दी ही आप बिलकुल शुद्ध दोहे लिखें ऐसी शुभकामनाएं हैं.

 

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