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मुक्तिका: यादों का दीप -- संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

यादों का दीप

संजीव 'सलिल'
*
हर स्मृति मन-मंदिर में यादों का दीप जलाती है.
पीर बिछुड़ने से उपजी जो उसे तनिक सहलाती है..

'आता हूँ' कह चला गया जो फिर न कभी भी आने को.
आये न आये, बात अजाने, उसको ले ही आती है..

सजल नयन हो, वाणी नम हो, कंठ रुद्ध हो जाता है.
भाव भंगिमा हर, उससे नैकट्य मात्र दिखलाती है..

आनी-जानी है दुनिया कोई न हमेशा साथ रहे.
फिर भी ''साथ सदा होंगे'' कह यह दुनिया भरमाती है..

दीप तुम्हारी याद हुई, मैं दीपावली मनाऊँगा.
दुनिया देखे-लेखे स्मृति जीवन-पथ दिखलाती है..

मन में मन की याद बसी है, गहरी निकल न पायेगी.
खलिश-चुभन पाथेय 'सलिल' बिछुड़े से पुनः मिलाती है..

मन मीरा या बने राधिका, पल-पल तुमको याद करे.
स्वास-आस में याद नेह बन नित नर्मदा बहाती है..
*
नर्मदा = नर्मम ददाति इति नर्मदा = जो मन-प्राणों को आनंद दे वह नर्मदा.

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Comment by विवेक मिश्र on October 30, 2010 at 12:00am
/आनी-जानी है दुनिया कोई न हमेशा साथ रहे.
फिर भी ''साथ सदा होंगे'' कह यह दुनिया भरमाती है../
विचित्र कितु सत्य. विशेषकर 'नर्मदा' शब्द का समास-विग्रह पढ़ते समय, अपने 'सरस्वती शिशु मंदिर' के संस्कृत विषय वाले आचार्य जी का स्मरण हो आया. इस सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए बधाई.
Comment by sanjiv verma 'salil' on October 29, 2010 at 8:53pm
dhanyavad naveen jee.

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