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नन्हा सा पौधा चला, पेड़ से करने दोस्ती

देख-देख दुनिया हँसी, मन ही मन में कोसती |
नन्हा सा पौधा चला, पेड़ से करने दोस्ती ||

कैसा गड़बड़झाल ये, जाने कैसा खेल है,
लोटे औ जलधाम का, होता कोई मेल है |
आ जाएगा घूम के, सबकी खोपड़ सोचती,
नन्हा सा पौधा चला, पेड़ से करने दोस्ती ||

पौधा है नवजात ये, कोमल इसकी डाल है,
हट्टा-कट्टा पेड़ तो, मानो गगन विशाल है |
बुढ़िया काकी देख के, उँगली मुँह में खोंसती,
नन्हा सा पौधा चला, पेड़ से करने दोस्ती ||

पौधा सच्चा शेर था, चलता अपनी चाल से,
ना की उनकी जात में, जो डरते कंकाल से |
बंदरियों की खीस भी, उतरी खुद को नोंचती,
नन्हा सा पौधा चला, पेड़ से करने दोस्ती ||

पौधे ने जैसा कहा, ठीक वैसा काम किया,
वीर जान के पेड़ ने, भी सादर प्रणाम किया |
अंड-बंड बकता रहा, बगल में बैठा पोस्ती,
नन्हा सा पौधा चला, पेड़ से करने दोस्ती ||

(चित्र स्वयं के द्वारा बनाया हुआ)

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Comment by Dr.Prachi Singh on October 16, 2012 at 5:55pm

सुन्दर कल्पना, बहुत सुन्दर चित्र............इस तरह की अलग रचनाएं पड़ना बहुत सुखकर लगता है.... हार्दिक बधाई कुमार गौरव जी 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 16, 2012 at 11:48am

बहुत अच्छे बहुत सुन्दर रचना कुमार गौरव अजितेंदु जी, रचना बेहद पसंद आई,बधाई 

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