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ऐ सुमन ऐसे न घूरो,मेरा दिल जला जाता है,
मैं वो भूला राही हूं,जो भूला चला जाता है।
मैं तो बहता पानी हूं,है जिसका नहीं भरोसा,
कल वां था आज यहां कल,कहीं और चला जाता है....................॥

कांटों से है राह भरा,जिस पर चलना मजबूरी,
तेरा मेरे साथ चलना,ऐसा भी क्या जरूरी।
हो फूल नाजुक तुम हवा,के साथ हिल मिलकर रहो,
गर्दिशों में आफतों में,तू फिर क्यों चला जाता है...................॥

तू जा किसी का हार बन,शोभा बढ़ा दिलदार की,
या तू किसी मंदिर में जा,मत कर खतां इकरार की।
या मधु को दे रस अपना,जो मधुमय कर देगा फिर,
दुष्ट हृदय मधुकर तो बस,रस चूसे चला जाता है....................॥

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Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on August 31, 2012 at 8:32pm
आदरणीय राक्तले जी आपका कथन जायज है राह मुझे भी खटक रहा था लेकिन अज्ञानता बस लिख बैठा हूं-क्षमाप्रार्थी हूं।
सादर
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on August 31, 2012 at 8:30pm
आदरणीया सीमा दी!हमारे गुरु श्री सौरभ जी का तो अता-पता नहीं है,आदरणीय अम्बरीष जी से किया गया निवेदन भी बेकार ही जा रहा है।अब इस गीत की कमी को कैसे दूर किया जाये आप ही बताने की कृपा करें।
Comment by Ashok Kumar Raktale on August 26, 2012 at 12:20am

आदरणीय त्रिपाठी जी

                    सादर, बहुत सुन्दर रचना किन्तु मुझे एक पंक्ति  "कांटों से है राह भरा,जिस पर चलना मजबूरी," में राह भरा कुछ सही नहीं लग रहा यदि आप राह भरी  या मार्ग भरा लिखते तो ठीक लगता. क्षमा करें मुझे नहीं मालुम कि वहाँ राह भरा होना जरूरी है इसलिए ऐसा लिख रहा हूँ.

Comment by seema agrawal on August 24, 2012 at 8:16pm

प्रिय विन्धेश्वरी भाई पता नहीं क्यों कई बार अलग-अलग लय में पढने के बाद भी मै कोई एक लय निश्चित नहीं कर पा रही हूँ रचना के लिए ....

रचना के भाव बहुत अच्छे और समृद्ध हैं 

अब सौरभ जी उपस्थित होंगे तो कुछ मार्ग दर्शन मिल सकेगा ...प्रतीक्षा कीजिये सही सुझाव का 

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