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ग़ज़ल : दराज़ पलकें, हसीन चेहरा...



दराज़ पलकें, हसीन चेहरा, वो दिलकशी और वो जो नजाकत |
कोई अगर लाजवाब हो तो, वो आवे देखे जवाब अपना ||

न मयकदा कोई रहना बाकी, न मयकशी न कहीं हो साकी |
अगर पलट दे मेरा ये दिलबर, जरा रुखों से नकाब अपना ||

खनकती आवाज़ शीशे जैसी, लचकती सी चाल हाय रब्बा |
वो माथे पे झूले नाग बच्ची, समझ के जुल्फों को नाग अपना ||

किसी मुस्स्विर का ख्वाब वो है, किसी तस्सवुर की है हकीकत ||
अगर कभी उसको देख ले तो, संवारे रागी रबाब अपना ||

अभी मेरे पास वो खडी थी, अभी मेरे पास वो नही है |
सदा मेरे साथ साथ चलती, खिला तस्सवुर में बाग़ अपना ||

कोई उसे है आग कहता, कोई उसे तो है राग कहता |
कोई संवारे उसे रंगों में, कोई तराशे है ताज अपना ||
दीप जीरवी...

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 11, 2010 at 10:34am
बहुत ही खुबसूरत ग़ज़ल है दीपक साहिब, जैसा की राणा साहब ने कहा, मकते की कमी अखर रही है, कृपया नजरे इनायत करना चाहेंगे |
Comment by Abhinav Arun on October 10, 2010 at 7:52am
खनकती आवाज़ शीशे जैसी, लचकती सी चाल हाय रब्बा |
वो माथे पे झूले नाग बच्ची, समझ के जुल्फों को नाग अपना ||"
दीप ज़ीरवी जी ,बहुत खूब आपकी लेखनी बिलकुल शब्द चित्र गढ देती है .बधाई. अच्छा लगा .

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on October 8, 2010 at 10:17pm
जनाब दीपक ज़ीरवी साहब
बहरे मुतकारिब मक्बूज़ असलम में कही गई ये ग़ज़ल(हालांकि मतला नहीं है) काबिले दाद है| हर शेर उम्दा है केवल मकते में बहार के मामले में आपकी नज़रेसानी की दरकार है|
खूबसूरत शायरी के लिए मुबारक हो|

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