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"जिंदगी से रूबरू हम"

अपनी ही जिन्दगी से शर्मसार हैं आज हम,
क्या बनने कि कोशिश थी, क्या बन गये हम|

जज्बातों कि लाश को सीढियाँ बना मंजिल तो पा ली,
पर क्या अब  खुद  को  इन्सान  कह  सकते हैं  हम|

अपनों की भीड़ में, अपनों को ढूंढ़ कर देख लिया,
अपना  तो न  मिला, खुद को  भी खो बैठे  हम|

हर एक रिश्ता बंध गया है, स्वार्थ की जंजीरों से,
न  जाने  कैसे  दलदल में  फंस  गये  हम|

ऐ खुदा ! तुझसे क्या शिकायत करें तेरी कुदरत को लेकर,
आज  अपनी  करतूतों  से तुझे भी शर्मिंदा  कर गये हम|

सुबह को उठकर शराब से जो मुंह धोते हैं रोजाना,
रात को कितनी पी, किससे हिसाब मांग रहे हम|

ये मत सोचना दोस्तों, सदा अफ़सोस करते हैं हालात पर,
अक्सर अपने आसुओं को मुस्कराहटों में बदला करते हैं हम

अपनी ही जिन्दगी से शर्मसार हैं आज हम,
क्या बनने कि कोशिश थी, क्या बन गये हम |

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Comment by savi on July 3, 2012 at 7:37pm
आदरणीय सुरेंदर कुमार शुक्ला जी,
जय श्री राधे|
रचना पसंद आई इसके लिए आपका धन्यवाद|
Comment by savi on July 3, 2012 at 7:35pm
आदरणीय योगराज जी,
बहुत बहुत आभार | भविष्य में भी आप  यूँ ही प्रोत्साहित करते रहेगें यही उम्मीद है|  
Comment by savi on July 3, 2012 at 7:30pm


आदरणीय रेखा जी,

जीवन के रंगमंच  अक्सर  में आंसुओं को मुस्कराहटों से छिपाना ही पड़ता है| आपका धन्यवाद|

Comment by savi on July 3, 2012 at 7:28pm
आदरणीय हरीश जी,
नमस्कार|
कविता की सच्चाई आप तक पहुंची इसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद|
Comment by savi on July 3, 2012 at 7:26pm
आदरणीय सौरभ जी,
कविता की विवेचना हेतु आपका बहुत बहुत धन्यवाद| आशा है आगे भी आपका मार्गदर्शन मिलता रहेगा|
Comment by savi on July 3, 2012 at 7:18pm
आदरणीय लक्ष्मण प्रसाद जी,
आपने सही कहा है समाज को  सुधारने के लिए कहीं से तो शुरुआत करनी होगी,  ये शुरुआत हम ही करे, पहला कदम हम ही उठाए, आज इसी की आवश्यकता है| प्रोत्साहन हेतु आपका बहुत बहुत आभार|
Comment by savi on July 3, 2012 at 7:16pm
आदरणीय योगी सारस्वत जी, 
प्रोत्साहन हेतु, आपका  बहुत बहुत आभार|
Comment by Yogi Saraswat on July 3, 2012 at 3:59pm

अपनी ही जिन्दगी से शर्मसार हैं आज हम,
क्या बनने कि कोशिश थी, क्या बन गये हम |

सुन्दर , विचारनीय रचना ! ऐसी ही रचनाओं की आज के समय में जरुरत है !

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on July 3, 2012 at 11:58am

अपनी ही जिन्दगी से शर्मसार हैं आज हम,क्या बनने कि कोशिश थी, क्या बन गये हम |आज देश और समाज में जो हो रहा है, उसके लिए कोई और नहीं हम ही जिम्मेदार और शर्मसार है और हमें ही कुछ कदम उठाने होंगे, आशावादी रहकर | ऐसी रचनाओ की जरूरत है, जो आगाह करे कुछ करने को | अच्छी रचना बधाई 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 2, 2012 at 10:39pm

कविता एक कविता होती है  --मनस-भावनाओं का अनयास संप्रेषण.  इस अनायस संप्रेषण को ही बाद में संयत विधा का प्रारूप दिया जाता है. संप्रेषण का माध्यम अनगढ़ हो अथवा सुगढ़ उसका विशिष्ट हेतु होता है.  उस हेतु के सधने बाद ही एक संप्रेषण को अनुशासन, व्याकरण या शास्त्रीयता का जामा देने की बात होती है ताकि उसका रूप साहित्य हो सके, उसकी पहुँच सार्वभौमिक बन सके. उस संप्रेषण का सार्वभौमिक होना ही उसे इस समाज का चेहरा व थाती हो जाने का अधिकार देता है.

रचनाकार के संप्रेषण को मात्र भावुक न हो कर उसे विधाओं की कसौटियों पर कसना ही होगा, चाहे तुक बद्धता की कसौटी पर अथवा अतुकांत की स्वतंत्रता और अलमस्ती की कसौटी पर.

सावीजी को इस प्रस्तुति हेतु हार्दिक शुभकामनाएँ.

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