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एक सूख कर टूटी हुई डाली थी ज़मीं पर,
वो आया और पतझड़ को भी सावन बना गया I
 
यूँ थाम अपने हाथ डाली मुस्कुरा उठा,
वो स्वप्न ज़िन्दगी के मौत में जगा गया I
 
पपड़ी थी तिरस्कार की डाली पे जो जमी,
नेह की शबनम से वो उसको हटा गया I
 
हक मान अपने हाथ डाली जिस्मों जान के,
ज्ञान बाण भेद वो कन्दरा गढा गया I
 
फिर सप्त छिद्र भेद के उस शून्य नली में,
प्यार की सरगम बहे, वंशी बना गया I
 
सुर रूप सजी बांसुरी, हो पूज्य सर्वदा,
कृष्ण के अधरों पे वो, उसको सजा गया I
 
आन बान शान हाथ सौंप बांसुरी,
ज़र्रे को ज़मीं के वो सितारा बना गया I

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Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on May 30, 2012 at 9:53am
प्राची जी धन्यवाद। आपको इस सुंदर रचना पर ढेरो बधाइयाँ। एक एक पंक्ति में सुंदर विम्ब के माध्यम से आपने अपनी बात कही है। विशेष कर ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगी ! पपड़ी थी तिरस्कार की डाली पे जो जमी, नेह की शबनम से वो उसको हटा गया I बहुत बहुत आभार!
Comment by Rekha Joshi on May 28, 2012 at 10:05pm

Prachi ji 

सुर रूप सजी बांसुरी, हो पूज्य सर्वदा,

कृष्ण के अधरों पे वो, उसको सजा गया I
 ati sundr rachna pr aapko badhai 
Comment by Bhawesh Rajpal on May 28, 2012 at 8:51pm
सुर रूप सजी बांसुरी, हो पूज्य सर्वदा,
कृष्ण के अधरों पे वो, उसको सजा गया I
 
अति सुन्दर !  हार्दिक बधाई ! 

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 28, 2012 at 6:13pm

बहुत सुन्दर भाव बांसुरी का बिम्ब बहुत बहुत ही बढ़िया लगा उसकी मर्जी से तो निस्तेज जिस्म में भी जान आ जाती है शुष्क जिंदगी में संगीत की लहर बह चलती है 

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