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::: गुलिस्तान ::: © (मेरी नयी क्षणिका )


कहने को तो तुम्हें दे देने थे, यह फूल मगर, ज़माने को यह गवारा न था !!
सूख चुके हैं फूल मगर, अब भी तत्पर हूँ देने को यह गुलिस्तान तुम्हें .. !!

जोगेन्द्र सिंह Jogendra Singh ( 25 सितम्बर 2010 )


.

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Comment by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on September 27, 2010 at 7:30pm
शुक्रिया... अलका जी......
Comment by alka tiwari on September 27, 2010 at 5:34pm
bhavnaon ka atirek..
Comment by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on September 26, 2010 at 10:29pm
@ बागी जी , शुक्रिया .........
Comment by Jogendra Singh जोगेन्द्र सिंह on September 26, 2010 at 10:28pm
धन्यवाद ,,, @ आशीष जी .......
Comment by आशीष यादव on September 26, 2010 at 11:39am
कहने को तो दो हो पंक्तिया है, लेकिन है कमाल की|

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 26, 2010 at 10:54am
बढ़िया

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