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क्यूँ तेरा अब ,तुझी पे इख्तियार नहीं

क्यूँ तेरा अब, तुझी पे इख्तियार नहीं?
कठपुतली बना, पर सोगवार नहीं ?

मेहनत पसीने की रोटियाँ तो तोड़
कि साथ देता ज़माना, हर बार नहीं

ज़मीर तो होगा ही दामन में तेरे
शोहरत न रहे, तू खतावार नही

वो छीन लेंगे तेरी आँखों का पानी
टिकती है खुदाई, कोई किरदार नहीं

खबरों में है पर दिलों में कहाँ
तू अपने ही खातिर, वफादार नहीं

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Comment

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Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on May 19, 2012 at 2:17pm

नीलांश जी आपके पास सुंदर भाव हैं और आपको ग़ज़ल की समझ भी है  आपने रदीफ़ और काफिया को अच्छी तरह निभाया है...बस थोड़ा बहर की कमी खल रही है...आशा करता हूँ आप इसे अन्यथा नहीं लेंगे ! आपको बहुत बहुत मुबारकबाद। दाद कुबूल करें !


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Comment by rajesh kumari on May 19, 2012 at 1:59pm

बहुत उम्दा ग़ज़ल खूबसूरत भाव 

Comment by आशीष यादव on May 19, 2012 at 12:23pm

वाह Nilansh सर, बेहतरीन रचना।
बधाई

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