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लगता है उसके पास कोई आईना नही

अपनी बुराइयाँ जो कभी देखता नही
लगता है उसके पास कोई आईना नही

गुलशन मे रहके फूल से जो आशना नही
उसका तो खुश्बुओ से कोई वास्ता नही

हम सा वफ़ा परस्त वतन को मिला नही
लेकिन हमारा नाम किसी से सिवा नही

मैं उससे कर रहा हू वफाओं की आरज़ू
जिस शक्स का वफ़ा से कोई राबता नही

तुम मिल गये तो मिल गयी दुनिया की हर खुशी
पास आने से तुम्हारे मेरे पास क्या नही

उनका ख्याल आया तो अशआर हो गये
अशआर कहने के लिए मैं सोचता नही

रहज़न हज़ार मिलते है राहो मे ऐ 'हिलाल'
अब हुमको रहबरी का कोई आसरा नही ,

Apni buraiyan jo kabhi dekhta nahi
Lagta hai uske paas koi aaina nahi

Gulshan me rehke phool se jo aashna nahi
Uska to khushbuo se koi wastaa nahi

Humsa wafa parast watan ko mila nahi
Lekin hamara naam kisi se siwa nahi

Mai usse ker raha hu wafao ki aarzu
Jis shaks ka wafa se koi raabta nahi

Tum mil gaye to mil gayi duniya ki har khushi
Paas aane se tumhare mere paas kya nahi

Unka khyaal aaya to ashaar ho gaye
Ashaar kehne k liye mai sochta nahi

Rehzan hazar milte hai raho me ai 'hilal'
Ab humko rehbari ka koi aasra nahi

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 21, 2010 at 8:44am
मैं उससे कर रहा हू वफाओं की आरज़ू
जिस शक्स का वफ़ा से कोई राबता नही,

बहुत खूब हिलाल साहिब, हिला कर रख दिया आपने, बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने , दाद कबूल कीजिये ,

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on September 20, 2010 at 10:05pm
बहुत खूब हिलाल साहिब
आपका कौशल देखते ही बनता है|
बेहतरीन ग़ज़ल..मुझे मतला और मकता दोनों बड़ा पसंद आया|

कृपया ध्यान दे...

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