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शंका-दोहा अष्टक-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

शंका-दोहा अष्टक
***
शंका दुख को जन्म दे, शंका मतकर व्यर्थ।
घर-बाहर इससे सदा, होता सकल अनर्थ।१।
*
आसपास जब-जब बढ़े, शंकाओं के शूल।
असमय जाते सूख तब, सुख के सारे फूल।२।
*
शंका नामक रोग  से, तन-मन जल भंगार।
औषध पाया खोज कब, इस का ये संसार।३।
*
लघुतम रहे विवाद को, शंका नित दे तूल।
संतों को असहज रहे, दुर्जन को अनुकूल।४।
*
शंका उस मन जन्म ले, जिसमें रहता खोट।
सदा  रक्तरंजित   रहे,  इससे  पाकर  चोट।५।
*
शंका बैरी चैन की, नफरत का यह द्वार।
प्रीत भरे परिवार  में, यह  भरती अंगार।६।
*
जो पड़ता इसके भँवर, रंक रहे या भूप।
दादुर जैसी गति करे, शंका अन्धा कूप।७।
*
शंका को मत पोष  मन, सुख को देगी मार।
कण्ठमाल सा मत पहन, झटपट इसे उतार।८।
***
मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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