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दोहा सप्तक. . . . नेता

दोहा सप्तक. . . . नेता

संसद में लो शोर का, शुरू हुआ नव सत्र ।
आरोपों की फैलती, बौछारें सर्वत्र ।।

अपशब्दों से गूँजता, अब संसद का सत्र ।
परिणामों से पूर्व ही, फाड़े जाते पत्र ।।

पावन मन्दिर देश का, संसद होता मित्र ।
नेता लड़ कर देश का, धूमिल करते चित्र ।।

कितने ही वादे करें, नेता चाहे आज ।
नग्न नयन के स्वप्न तो, टूटें बिन आवाज । ।

संसद में नेता करें, बात -बात पर तर्क ।
जनता की हर आस का, होता बेड़ा गर्क ।।

नेताओं के पास कब , जाता भला गरीब ।
अपने श्रम से वो गढ़े , अपना सुप्त नसीब ।।

कुर्सी मिलते ही हुआ, नेताओं का हाल ।
गाड़ी बँगला अरु मिले, गुप्त रूप से माल ।।

सुशील सरना / 31-7-24

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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