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ग़ज़ल नूर की- ज़ुल्फ़ों को ज़ंजीर बना कर बैठ गए

.
ज़ुल्फ़ों को ज़ंजीर बना कर बैठ गए
किस किस को हम पीर बना कर बैठ गए.
.
यादें हम से छीन के कोई दिखलाओ
लो हम तो  जागीर बना कर बैठ गए.  
.
दुनिया की तस्वीर बनानी थी हम को
हम तेरी तस्वीर बना कर बैठ गए.  
.
मौक़ा रख कर भेजा था नाकामी में
आप जिसे तक़दीर बना कर बैठ गए.
.
मैंने कॉपी में इक चिड़िया क्या मांडी
दुनिया वाले तीर बना कर बैठ गए.
.
चलती फिरती मूरत देख के हम नादाँ
मंदिर की तामीर बना कर बैठ गए.
.
हँसते हँसते मेरी कब्र पे आए फिर
वो चेहरा गम्भीर बना कर बैठ गए.
.
वो जो मुआफ़ी-नामे लिखता रहता था
आप उसे ही  वीर बना कर बैठ गए.
.
निलेश 'नूर'
मौलिक/ अप्रकाशित 

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Comment by सालिक गणवीर on February 3, 2022 at 1:38pm

आदरणीय  भाई  Nilesh Shevgaonkar जी
सादर अभिवादन
बहुत उम्दः ग़ज़ल कही है ,शैर दर शैर दाद और मुबारक़बाद क़ुबूल करें।

कृपया ध्यान दे...

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