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ग़ज़ल (तुझे है जीतने की धुन तो ये इक़रार ले पहले)

1222 - 1222 - 1222 - 1222

तुझे  है जीतने  की  धुन तो ये  इक़रार ले पहले

न  हारेगा  कभी भी तू  किसी भी हार  से पहले 

अगर  कुंदन  के जैसा  चाहता है तू चमकना तो

ज़रा शो'लों के दरियासे तू  ख़ुद को तारले पहले 

हवाओं की तरह आज़ाद बहना अच्छा लगता है 

तो परवा छोड़  दुनिया की  ज़रा रफ़्तार ले पहले 

फ़रिश्तों  की तरह  मासूम होना है तेरी ख़्वाहिश

इताअत में तू रब की इस ख़ुदी को मार ले पहले  

तुझे महताब के मानिंद  है अनवार की ख़्वाहिश 

मुक़ाबिल शम्स आकर इक ज़रा दीदार ले पहले

बना ले अपना रस्ता ख़ुद उमड़ता जब चले पानी 

तुझे गर  साथ चलना  है पकड़ मझधार ले पहले 

कुशादा  आसमाँ-सा  रूप  चाहत  है  अगर  तेरी 

समा ले कहकशाँ को ख़ुद में जो विस्तार ले पहले 

तुझे आतिश की फ़ितरत पर बड़ा ही रश्क होता है 

ख़ुद आतिश  होना चाहे  तो  पहन अंगार ले पहले 

ज़मीं-सा मरतबा चाहे, नहीं आसान 'अमीर' इतना 

तमन्ना  आरज़ू   अरमाँ  सभी  को  मार   ले  पहले  

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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