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अच्छे दिन - लघुकथा -

अच्छे दिन - लघुकथा -

"गुड्डू, लो देखो मैं तुम्हारे लिये कितनी सारी ज्ञान वर्धक जानकारी की पुस्तकें लाया हूँ।"

"दादा जी, आप कहाँ से लाये और कैसी पुस्तकें हैं? आप तो पार्क में टहलने गये थे।"

"हाँ बेटा, वहीं पार्क के गेट के बाहर फुटपाथ पर एक लड़का पुस्तकें, पत्रिकायें, समाचार पत्र आदि बेचता है। शिक्षाप्रद कहाँनियों की पुस्तकें हैं|"

"क्या इससे उसका गुजारा हो जाता है?"

"बेटा, वह एम ए, बी एड है, लेकिन नौकरी नहीं है। अतः इसके साथ ही वह लोगों के पानी, बिजली और टेलीफोन के बिल भी जमा कराता है। रात को ट्यूशन भी देता है|"

"क्या इतना समय मिल जाता है उसे?"

"बेटा, समय तो निकालना पड़ता है। सुबह शाम किताब बेचता है।दोपहर में बाकी काम करता है।लोग सुबह बिल और पैसे दे जाते हैं और शाम को ले जाते हैं।"

"दादा जी,क्या यही अच्छे दिन हैं? कितनी बेरोजगारी, मंहंगाई और भ्रष्टाचार बढ़ रहा है?"

"बेटा इन हालात को देखते हुए तो लगता नहीं कि निकट भविष्य में अच्छे दिन की कोई संभावना है।"

"आपको ऐसा क्यों लग रहा है?"

"बेटा अभी अच्छे दिन नेताओं के हैं,डाक्टरों के हैं। क्योंकि इनके ही द्वारा देश में शिक्षा और चिकित्सा का व्यवसायीकरण हो चुका है।"

"इसमें सुधार नहीं होगा क्या?"

"हाल फिलहाल तो ऐसे आसार  दिखाई नहीं पड़ते।इस देश में शिक्षा के स्तर का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि पुस्तकें फुटपाथ पर बिक रही हैं और जूते वातानुकूलित शो रूम में।"

मौलिक, अप्रकाशित एवम अप्रसारित

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Comment by TEJ VEER SINGH on July 20, 2020 at 6:15pm

हार्दिक आभार आदरणीय  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 20, 2020 at 5:43pm

आ. भाई तेजवीर जी सादर अभिवादन । अच्छी कथा हुई है । हार्दिक बधाई स्वीकारें ।

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