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धूप छाँह होने वाले

तमाम उम्र लगे रहे शहर शहर हो जाने में 
क्यों गांव गांव आज फिर होने लगी है ज़िंदगी 
 
परवाजों की अदम्यता  पांखी उड़े गगन गगन  
क्यों पांव पांव आज फिर  ढोने  लगी है ज़िंदगी 
 
इंद्रधनुष चुरा चुरा होली से खेलते रहे 
क्यों श्वेत श्याम आज फिर  होने लगी है ज़िंदगी 
 
फासलों की फसलें जड़ से उखाड़ फैंक दी  
क्यों सांय सांय आज फिर  रोने  लगी है ज़िंदगी 
 
फौलादी से  जहान में बुनियाद सी  ही  बन गए 
क्यों धांय धांय आज फिर  बोने लगी है ज़िंदगी  
 
किलों की कारागार सी धूप  कैद  हो गयी 
क्यों छांव  छावं आज फिर सोने लगी है ज़िंदगी 
.
धूप छाँह होने वाले दिन  सभी  बदल गए 
क्यों  सांझ सांझ आज फिर धोने  लगी है ज़िंदगी 
..
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on April 1, 2020 at 7:50pm

मुहतरमा अमिता तिवारी जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

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