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कोरोना का क्या रोना

जितना हो सकता हो दूरियां बनाइये
मुख से न कहके नयन से जताइये

घबराइये न दिल को दिलासा दिलाइये
विपदा की घड़ी में भी बस  मुस्कुराइये

जीभर  के बात अपनी सबको सुनाइये
बस थोड़ा और अपने मुँह को घुमाइये

घर जो आये हाथ  सोप से धुलाइये
पी के नींबू नींद भी गहरी लगाइये

बस प्राणायाम योग  ध्यान आजमाइये
प्रतिरोध की जो क्षमता उसको बढाइये

जो होलिका है भीतर उसको जलाइये
गुटके की पीक यूँ न हवा में  उड़ाइये

हो घूमने का मन  तो जरा भांग खाइये
तन हो न  टस से मस दिमाग को घुमाइये

वो मौज मस्ती सैर सपाटा भुलाइये
बाहर के खाने को न हाथ भी लगाइये

सामान हाट से न थोक में मंगायिये
गोदाम भूलकर भी न घर को बनाइये

बातों में बस विरोध के सुर न उठाइये
अपने सिपाहियों का मनोबल बढाइये
मौलिक व अप्रकाशित ओ बी 126

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Comment by Samar kabeer on March 28, 2020 at 4:58pm

अगर ये ग़ज़ल नहीं है,तो ठीक है,बधाई ।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on March 28, 2020 at 4:20pm

आदरणीय सर सादर प्रणाम । इसमें हर पंक्ति में बस मैंने 23 मात्राओं का आकलन किया है। दूसरी पंक्ति में बात शब्द आना था वह से रह गया है। सादर

Comment by Samar kabeer on March 28, 2020 at 4:07pm

इस रचना के अरकान लिखिये ।

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