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कुछ ख्वाबों के बीज लाकर

मैंने दिल के गमले में बोये थे।

पसीने का पानी पिलाकर

पौधे भी उगा दिये।

वो बात और है कि

गमले की मिट्टी मेरे दिल में भर गई।

और दिल भर देख भी नहीं पाया

मैं उन पौधों को - उसके फूलों को।

क्योंकि मैं अकेला था...

काश! तुम साथ होते।

हम बुहारते रहते एक-दूसरे के दिल में भरी मिट्टी।

हम साथ ही सूंघते स्वप्न-पुष्पों की सुगंध भी।

खैर, अब तुम्हारे भी ख्वाब बदल गये

और मेरे भी।

मैं नए बीज ले आया हूँ,

नए गमले में बो रहा हूँ।

स्वप्न-पुष्पों की महक से परहेज़ के साथ-साथ,

डॉक्टर ने मुझे बिना मिट्टी के गमलों का नुस्खा लिखा है।

और जानता हूँ… तुम्हें भी यही लिखा है…

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on February 18, 2020 at 9:38am

रचना पसंद करने और अपनी टिप्पणी द्वारा मेरा उत्साहवर्धन करने हेतु बहुत-बहुत आभार आदरणीय  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'  जी सर।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 17, 2020 at 11:46am

आ. भाई चंद्रेश जी, अच्छी कविता हुई है । हार्दिक बधाई । 

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on February 17, 2020 at 9:52am

आदाब जनाब समर कबीर जी सर, कविता पर आकर मेरी हौसला अफ़ज़ाई करने के लिए दिली शुक्रिया आपका।

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on February 17, 2020 at 9:51am

रचना पसंद करने और अपनी टिप्पणी द्वारा मेरा उत्साहवर्धन करने हेतु बहुत-बहुत आभार आदरणीय तेजवीर सिंह जी सर।

Comment by Samar kabeer on February 16, 2020 at 8:33pm

जनाब चंद्रेश जी आदाब,अच्छी कविता लिखी आपने,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by TEJ VEER SINGH on February 15, 2020 at 12:07pm

हार्दिक बधाई आदरणीय चंद्रेश जी। बेहतरीन कविता।

काश! तुम साथ होते।

हम बुहारते रहते एक-दूसरे के दिल में भरी मिट्टी।

हम साथ ही सूंघते स्वप्न-पुष्पों की सुगंध भी।

खैर, अब तुम्हारे भी ख्वाब बदल गये

और मेरे भी।

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